मार्गशीर्ष ,यह वही तिथि है जब एकादशी देवी का दिव्य जन्म हुआ था—अधर्म का अंत करने और भक्तों को मोक्ष के द्वार तक ले जाने के लिए। पूजा-विधि केवल कर्म नहीं, बल्कि अंतर्मन की यात्रा है—जहाँ व्रत करने वाला धीरे-धीरे संसार की अशुद्धियों से निकलकर विष्णु की शरण में लौटता है।
उत्पन्ना एकादशी – पूजा-विधि
मार्गशीर्ष ,यह वही तिथि है जब एकादशी देवी का दिव्य जन्म हुआ था—अधर्म का अंत करने और भक्तों को मोक्ष के द्वार तक ले जाने के लिए। पूजा-विधि केवल कर्म नहीं, बल्कि अंतर्मन की यात्रा है—जहाँ व्रत करने वाला धीरे-धीरे संसार की अशुद्धियों से निकलकर विष्णु की शरण में लौटता है।
1. प्रातःकालीन शुचिता – मन, देह और प्राण का पवित्रीकरण
सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठें। जैसे स्वयं विष्णु की श्वास ब्रह्मांड को छूती है, वैसे ही आप भी शांत, निर्भार मन से इस दिन की शुरुआत करें।
• स्नान करें—गंगाजल मिलाकर।
• स्नान का अनुभव ऐसा हो जैसे आपके भीतर के रजोगुण और तमोगुण धुलकर केवल सात्विक प्रकाश बच गया हो।
साफ, हल्के एवं पीले/सफेद वस्त्र पहनें। इस रंग में स्वयं भगवान नारायण की शांत आभा बसती है।
2. संकल्प – आत्मा का व्रत से संवाद
दीपक जलाकर ईशान कोण (North-east) की ओर बैठें।हाथ में जल लें। मन में कहें—
"मैं आज उत्पन्ना एकादशी का व्रत विष्णु-चरणों में समर्पित करता/करती हूँ। हे देव, मेरे भीतर जन्मे अधर्म को नष्ट कर मुझमें धर्म, शांति और मोक्ष का प्रकाश प्रकट हो।" संकल्प वही क्षण है जब आपका लोकिक मन देवत्व की ओर बढ़ता है।
3. मंडप और वेदी की स्थापना
पीले वस्त्र पर एक छोटा-सा विष्णु आसन तैयार करें।
• बीच में शंख, चक्र, गदा, पद्म की छोटी-सी प्रतीक स्थापना।
• विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर
• तुलसी दल, पीला फूल, दीपक, अगरबत्ती, कपूर
• एक थाली में अक्षत (चावल), रोली, गंगाजल
• एक थाली में फल, पंचामृत
• भोग हेतु गुड़, सूखे मेवे, तुलसी पत्र
वेदी की रचना ऐसे करें जैसे आप स्वयं वैकुंठ के द्वार पर पूजा सजा रहे हों।
4. दीप-प्रज्वलन – अंधकार से प्रकाश की ओर
दीपक जलाएँ। दीपक की लौ से ऐसा अनुभव हो कि आपके पाप, संशय और भय , लौ की ऊष्मा में पिघल रहे हों। कहें— "यह दीप मेरे भीतर जन्मी एकादशी देवी को समर्पित है।"
5. आह्वान – एकादशी देवी एवं विष्णु की उपस्थिति
सुगंधित धूप जलाएँ। मंत्र का उच्चारण करें— "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या "ॐ विष्णवे नमः" गंभीर, धीमी, नादमयी ध्वनि में। हर मंत्र के साथ ऐसा लगे कि आपका मन शांत झील की तरह स्वच्छ और स्थिर हो रहा है। अब एकादशी देवी का स्मरण करें—
"हे देवि, जो अपार शक्तियों की जननी हैं,
जो अधर्म को तिरोहित करती हैं,
जो विष्णु की प्रियतम ऊर्जा हैं—
आप आज मेरी चेतना में प्रकट हों।"
6. अभिषेक और अर्पण
यदि घर में विष्णु की प्रतिमा है— उन्हें हल्के, गर्म गंगाजल से स्नान कराएँ। फिर क्रम से अर्पण—
• गंगाजल
• पंचामृत
• चंदन
• अक्षत
• फूल
• तुलसी
तुलसी अर्पण करते समय कहें— "विष्णु-प्रिया तुलसी, मेरी भक्ति को स्वीकार कर इसे विष्णु चरणों तक पहुँचाएँ।"
7. कथा-पाठ – एकादशी देवी के जन्म की स्मृति
अब उत्पन्ना एकादशी की कथा शांत मन से पढ़ें या सुनें। कथा का स्मरण वह क्षण है जब मनुष्य अपने भीतर भी
धर्म की उसी जन्म-ऊर्जा को अनुभव कर सकता है।
8. विष्णु सहस्रनाम / गीता का 12वाँ अध्याय
यदि संभव हो, इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ श्रेष्ठ माना गया है। यदि समय कम हो तो— श्रीमद्भगवद्गीता – भक्ति योग (अध्याय 12) पढ़ें। इस पाठ के बाद हृदय में एक सूक्ष्म दिव्यता उतरती है— जैसे भगवान स्वयं भीतर बैठ गए हों।
9. भोग और आरती
भगवान को—
• खीर
• सूखे मेवे
• गुड़
• फल
• तुलसी
का भोग लगाएँ। फिर शांत, सौम्य आरती करें। लौ को देखकर मन में कहें— "जैसे यह दीप अंधकार हर रहा है,
वैसे ही आज के दिन मेरे भीतर के अधर्म, भ्रम, भय और अज्ञान का अंत हो।"
10. व्रत नियम
• दिन भर सात्त्विक रहें
• नमक, तामसिक आहार, नकारात्मक विचार न रखें
• यदि शरीर सक्षम हो तो पूर्ण उपवास
• अन्यथा फलाहार या केवल जल
यह व्रत का सार है— इंद्रियों को साधकर आत्मा को ऊँचा उठाना।
11. रात्रि-जागरण – दिव्य जन्म की प्रतीक्षा
क्योंकि इसी रात एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए रात्रि को हल्का-सा जागरण करें।
मंत्र जपें— "ॐ नमो नारायणाय" जैसे-जैसे रात गहराती है, आपके भीतर ईश्वर की शांति और भी गहन होती जाती है।
12. द्वादशी का पारण
अगली सुबह— तुलसी जल से भगवान को स्नान कराएँ। सरल सात्त्विक भोजन बनाकर पारण करें। कहें—
"आज का यह व्रत मेरी आत्मा को धर्म के प्रकाश से भर दे, और मेरे जीवन से अधर्म की छाया सदा के लिए मिट जाए।"
**पूजा-विधि का सार
(आध्यात्मिक अर्थ)** उत्पन्ना एकादशी की पूजा केवल धर्म का पालन नहीं— अपने भीतर जन्मी दैवी शक्ति को पहचानने की प्रक्रिया है। यह वह तिथि है जब मनुष्य समझता है— वह केवल शरीर नहीं, बल्कि एक शाश्वत आत्मा है जो ईश्वर की ओर लौटने की यात्रा पर है।
# Story:-
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
जब ब्रह्मांड की साँसें गहरी हो उठीं
मार्गशीर्ष का महीना था। हवाओं में ठंडक थी पर आकाश में एक अदृश्य तपिश तैर रही थी— जैसे ब्रह्मांड स्वयं ध्यान में बैठा हो, और समय अपनी आँखे मूँदकर किसी प्राचीन रहस्य को सँभाले खड़ा हो। ऐसे ही किसी क्षण में धरती, स्वर्ग और दिशाओं ने महसूस किया— धर्म का प्रकाश मंद पड़ रहा है।
मुर नामक एक दैत्य अपनी विकृत इच्छा और अहंकार से सृष्टि के संतुलन को तोड़ रहा था। यज्ञों की अग्नि काँपने लगी, ऋषियों की प्रार्थनाएँ आकाश तक पहुँचकर लौट आने लगीं, और देवताओं के हृदय में भी एक असहाय थरथराहट उठी। सृष्टि के अनेक युगों में यह पहला अवसर था जब देवता एक साथ एक ही दिशा में चले—
विष्णु के द्वार की ओर।
देवताओं का प्रार्थना-सागर
भगवान विष्णु के समक्ष सभी देवता ऐसे खड़े थे ,मानो ब्रह्मांड का हृदय अपने ही धड़कनों का बोझ लेकर आया हो। उनके नेत्रों में नमी, उनकी वाणी में कंपकँपाहट, और उनकी आत्मा में एक ही पुकार— “प्रभो, हमें संरक्षण दीजिए।” विष्णु ने अपनी शान्त, गम्भीर, महासागर-सी आँखें उठाईं। उनके नेत्रों में जो प्रकाश था, वह आश्वासन नहीं— बल्कि ब्रह्मांड का नियम था। “धर्म को डिगने नहीं दूँगा,” उन्होंने जैसे मौन में कहा, और पूरा आकाश उनके संकल्प से दीप्त हो उठा।
असंख्य वर्ष का युद्ध — और एक थका हुआ क्षण
विष्णु और मुर दैत्य के बीच हज़ारों वर्ष तक युद्ध होता रहा। वह युद्ध केवल अस्त्रों का नहीं था— वह था प्रकाश और अंधकार के स्पन्दनों का, जो धरा, आकाश, पाताल तीनों को हिलाता रहा। अंततः भगवान विष्णु, सृष्टि के सभी प्राणियों की थकान को महसूस करते हुए बदरिकाश्रम की हिम-गुफाओं में विश्राम करने पहुँचे। गुफा के भीतर शान्ति थी— जैसे हिमालय स्वयं भगवान को गोद में सुला रहा हो। विष्णु ने पलकों को बंद किया और सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक क्षण के लिए स्थिर हो गया।
दैत्य का प्रवेश — और दिव्य चमत्कार का जन्म
मुर, जो अवसर का इच्छुक था, गुफा के भीतर पहुँचा ताकि सोते हुए विष्णु पर प्रहार कर सके। पर जैसे ही उसने अपना शस्त्र उठाया— विष्णु के शरीर से एक दिव्य, तेजस्विनी, अलौकिक शक्ति प्रकट हुई। उसके प्रकट होते ही गुफा प्रकाश-पुंज बन गई, जैसे सुबह की पहली किरण रात के बहरे सन्नाटे को चीर देती है। उस दिव्य महाशक्ति का रूप— ना पूर्ण रूप से अग्नि, ना पूर्ण रूप से प्रकाश, बल्कि दोनों का वह पवित्र संगम जिसे केवल धर्म कहा जा सकता है। वह शक्ति ही थी— देवी एकादशी। उनके उठते ही सृष्टि में ऐसा कंपन हुआ मानो धरती ने एक नया जन्म लिया हो। देवी ने मुर दैत्य को उसी क्षण अपने तेज के स्पर्श से समाप्त कर दिया। अहंकार का अंत हुआ और धर्म का सूर्य पुनः उदित हुआ।
विष्णु का आशीर्वाद — स्वर्ग का एक शाश्वत क्षण
जब विष्णु जागे और उन्होंने उस दिव्य स्त्री को देखा, उनके अधरों पर मधुर मुस्कान खिली। उन्होंने कहा—
“हे देवी, तुम मेरे भीतर से उत्पन्न हुई हो। तुम्हारा नाम होगा उत्पन्ना। जो मनुष्य तुम्हारे दिन उपवास करेगा वह अपने पापों के सभी बंधनों से मुक्त हो जाएगा। और तुम्हारी कृपा से वह आत्म-प्रकाश की ओर चलेगा।”
देवी ने विनम्र भाव से कहा— “प्रभो, मेरा व्रत करने वाले को आपकी भक्ति, शांति और मोक्ष-मार्ग भी प्राप्त हो।” विष्णु ने धीरे से कहा— “तथास्तु।” उस दिन आकाश स्थिर हो गया। समय ने स्वयं अपनी गति धीमी कर दी।
और उत्पन्ना देवी की ऊर्जा ब्रह्मांड में धर्म की शाश्वत संरक्षक शक्ति बनकर फैल गई।
कथा का मर्म — आध्यात्मिक अर्थ
उत्पन्ना एकादशी हमें बताती है—जब अहंकार बढ़ता है, तो दिव्यता अपने आप जन्म लेती है। जब अंधकार गहन होता है, तो प्रकाश किसी न किसी रूप में प्रकट होता ही है और जब मनुष्य अपने भीतर पाप, द्वेष और भार उठा लेता है, तो एकादशी जैसी दिव्य ऊर्जा उसे पुनः जन्म देती है— भीतर से, आत्मा से।
यह व्रत केवल भोजन को त्यागना नहीं, बल्कि मन को कुसंस्कारों से मुक्त करना है। मन से वासना हटाना,
हृदय से घृणा मिटाना, कर्मों से आलस्य को हटाना— यही वास्तविक एकादशी है। उत्पन्ना देवी कहती हैं— “मनुष्य का प्रत्येक पाप सिर्फ कर्म नहीं—ऊर्जा है और एकादशी का व्रत उस ऊर्जा को पवित्र प्रकाश में रूपांतरित करने का तप है।” एकादशी व्रत वह क्षण है जब आत्मा अपने भीतरी आलोक को पहचानती है—
और भगवान से जुड़ने के लिए अहंकार की गांठें खोलती है।
*जब रात प्रकाश बन जाती है-
मार्गशीर्ष की उत्पन्ना एकादशी वह तिथि है जब ब्रह्मांड यह याद दिलाता है— “युद्ध बाहर का नहीं है। युद्ध भीतर का है।” असुर बाहर नहीं— मन में जन्मते हैं और देवी बाहर नहीं— मन में प्रकट होती हैं। जो इस दिन व्रत करता है
वह स्वयं में उसी दिव्य तेज का अनुभव करता है जिसने मुर जैसे दैत्य को समाप्त कर धर्म की रेखा को पुनः उजागर किया था।
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥