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मोक्षदा एकादशी

मोक्षदा एकादशी मुक्ति, करुणा और आत्मोद्धार की तिथि है। इस दिन का व्रत न केवल स्वयं के लिए,
बल्कि– पूर्वजों, पितरों और किसी भी आत्मा के उद्धार के लिए किया जा सकता है। पूजा-विधि का हर चरण ,आपको धीरे-धीरे अधर्म, भ्रम और अज्ञान की परतें हटाते हुए आत्मिक प्रकाश तक ले जाता है।

मोक्षदा एकादशी – संपूर्ण पूजा-विधि
मोक्षदा एकादशी मुक्ति, करुणा और आत्मोद्धार की तिथि है। इस दिन का व्रत न केवल स्वयं के लिए,
बल्कि– पूर्वजों, पितरों और किसी भी आत्मा के उद्धार के लिए किया जा सकता है। पूजा-विधि का हर चरण ,आपको धीरे-धीरे अधर्म, भ्रम और अज्ञान की परतें हटाते हुए आत्मिक प्रकाश तक ले जाता है।
1. प्रातः स्नान व शुचिता – पवित्रता का प्रथम द्वार
• ब्रह्ममुहूर्त में जागें
• गंगाजल से स्नान करें (या गंगाजल मिलाकर)
• पीले/सफेद वस्त्र धारण करें
• मन में यह भाव रखें—
“आज का दिन मेरे और मेरे पितरों की मुक्ति का दिन है।” यह केवल स्नान नहीं, बीते जन्मों की कालिमा उतारने का पहला चरण है।
2. संकल्प – जहाँ आत्मा अपने उद्देश्य को पहचानती है
पूर्व दिशा में बैठकर हथेली में जल लें और दीपक प्रज्वलित करें। संकल्प मंत्र का भाव— “मैं अमुक व्यक्ति (या पितर) की मुक्ति हेतु मोक्षदा एकादशी का व्रत करता/करती हूँ। हे श्रीहरि, इस व्रत का पुण्य उनकी आत्मा को प्रकाश प्रदान करे।”
संकल्प वह क्षण है , जब आपका मन वैकुण्ठ की दिशा में मुड़ता है।
3. वेदी की स्थापना — अपने घर में वैकुण्ठ का निर्माण
एक सुंदर स्वच्छ आसन पर—
• श्रीविष्णु / कृष्ण की मूर्ति या चित्र
• शंख
• चक्र प्रतीक
• तुलसी
• धूप–दीप
• गंगाजल
• चंदन
• पीले/सफेद पुष्प
• फल, गुड़, खीर (भोग हेतु)
वेदी को ऐसे सजाएँ मानो भगवान स्वयं पधारने वाले हों।
4. दीप-प्रज्वलन — अज्ञान के अंधकार का नाश
दीप जलाकर दोनों हाथ जोड़ें— “हे प्रभु, जैसे यह लौ अंधकार मिटा रही है, वैसे ही मेरे पितरों का अंधकार भी मिट जाए।” दीपक की लौ मोक्षदा एकादशी में एक अलौकिक प्रतीक मानी गई है।
5. आचमन एवं शुद्धि मंत्र
किसी भी पूजा की आत्मा है— मन की शुद्धि। गंगाजल से आचमन करें और मंत्र का भाव मन में रखें— “हे विष्णु, मेरे विचार, वाणी और कर्म आज तुम्हारी शरण में हैं।”
6. श्रीविष्णु का आवाहन
‘ॐ नमो नारायणाय’ का जाप करते हुए भगवान का ध्यान करें।
फिर कहें— “हे श्रीहरि, आप ही मोक्षदाता हैं, आप ही पितृमित्र हैं। आज आपकी कृपा से अनेक आत्माएँ प्रकाश को प्राप्त हों।”
7. विष्णु पूजन — हृदय में प्रकाश का अवतरण
निम्न क्रम से पूजा करें:
1. गंगाजल अर्पण
2. अक्षत, चंदन, रोली
3. पीले या सफेद पुष्प अर्पण
4. तुलसी-दल अर्पण (सर्वोत्तम)
5. धूप-दीप प्रदक्षिणा
6. नैवेद्य (खीर/मिष्ठान्न/फल)
7. जल अर्पण – मोक्ष प्रार्थना
पूजा करते समय यह भाव बनाएँ— “मेरी आज की हर भक्ति किसी आत्मा को प्रकाश प्रदान कर रही है।”
8. कथा-स्मरण (मोक्षदा एकादशी उपाख्यान)
पूजा के बाद राजा वैखानस और उनके पिता वज्रांक की मोक्ष प्राप्ति की कथा सुनें/पढ़ें। क्योंकि कथा का स्मरण
पूजा को फलदायी बनाता है।


9. विष्णु सहस्रनाम / गीता अध्याय 12 का पाठ
मोक्षदा एकादशी में दो पाठ अत्यंत श्रेष्ठ माने गए हैं—
• विष्णु सहस्रनाम
• गीता का भक्तियोग (अध्याय 12)
जब आप यह पाठ करते हैं, आपकी चेतना उठकर मन–बुद्धि की सीमाओं से बाहर जाती है।
10. पितरों के लिए विशेष अर्पण (मुख्य भाग)
इस व्रत की रीढ़ है—
#पुण्य का समर्पण#
घी का दीपक लेकर भगवान विष्णु के सामने कहें— “हे प्रभु, मैं आज के व्रत, उपवास, पूजा, भक्ति और हृदय से किए गए प्रत्येक पुण्य को अमुक पितर / आत्मा को समर्पित करता/करती हूँ। उन्हें प्रकाश, शांति और मोक्ष प्राप्त हो।” यह वह क्षण है जहाँ मोक्षदा एकादशी का दिव्य रहस्य सक्रिय होता है।
11. रात्रि-जागरण — आत्माओं का उदय-क्षण
रात को कम से कम एक घंटा जागें। मंत्र जाप करें— “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” यह जागरण सिर्फ आपके लिए नहीं— उन आत्माओं के लिए भी होता है जिन्हें आप आज प्रकाश दे रहे हैं।
12. द्वादशी पारण – मुक्ति का अंतिम द्वार
दूसरे दिन सूर्योदय के बाद पारायण (व्रत खोलना) करें— सात्त्विक भोजन लें (खीर, चावल, मूंग, फल आदि)। साथ ही यह प्रार्थना कहें— “आज के व्रत का फल सभी पितरों को प्राप्त हो। हे श्रीहरि, प्रत्येक आत्मा का अंधकार मिटे और वे शांति के लोक जाएँ।”
मोक्षदा एकादशी का आध्यात्मिक सार
• यह व्रत दूसरों की आत्मा को मोक्ष देने का सबसे श्रेष्ठ मार्ग है।
• यह आपको करुणा, पितृधर्म और समर्पण की शक्ति देता है।
• इसके पुण्य से मनुष्य जीवन में जन्म–मरण का भय मिटता है।
• इस दिन आप स्वयं भी आध्यात्मिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते हैं।

# मोक्षदा एकादशी – कथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।

दिसंबर की ठंडी संध्या थी। सूर्य अपने कदम धीरे-धीरे पर्वत के पीछे छिपा रहा था। आकाश में हल्की कुहासे की चादर थी— मानो प्रकृति स्वयं किसी दैवी रहस्य का संकेत दे रही हो। उसी समय, चित्रावती नगरी के राजप्रासाद में एक बेचैनी जन्म लेने लगी। यह नगरी के महान राजा — वैखानस महाराज — की आत्मा की बेचैनी थी।

राजा का अशांत हृदय
राजा वैखानस (संस्कृत: वैखानस) धर्म को धारण करने वाले, न्यायप्रिय और सत्यप्रिय शासक थे। फिर भी उस दिन उनकी आँखों में एक अजीब-सी नमी चमक रही थी। आधी रात के समय वे अचानक उठकर राज-महल की बालकनी में पहुँचे। चंद्रमा मानो किसी प्रश्न के उत्तर की तरह शांत था, और हवा में एक अनजाना दुःख बह रहा था।
राजा बुदबुदाए— “हे प्रभु… यह अशांति क्यों? मैं इतना धर्म करता हूँ, फिर भी यह हृदय क्यों काँपता है?”
ऐसा लगा मानो भीतर कहीं अनजानी पीड़ा जन्म ले रही हो। अंततः राजा ने निश्चय किया— वह इस प्रश्न का उत्तर
सिर्फ एक ही स्थान से पा सकते हैं— विधानाचल पर्वत पर स्थित ऋषि पाराशर के आश्रम से।
ऋषि पाराशर का आश्रम
कुछ दिनों की कठिन यात्रा के बाद राजा वैखानस ऋषि पाराशर के आश्रम पहुँचे। मंत्र-ध्वनि की लहरें वातावरण को पवित्र कर रही थीं। गायत्री की शांत तरंगें मानो प्रकृति को सोने-सा उजला कर रही थीं। ऋषि पाराशर—
चाँदी जैसे केश, शांत नेत्र, और वाणी में देवत्व की झंकार।
राजा ने दंडवत प्रणाम किया— “हे भगवन्, मेरे भीतर एक अजीब-सा दुःख जन्म ले रहा है। कृपा कर बताइए— इसका कारण क्या है?” ऋषि ने गहरी दृष्टि से राजा को देखा, और कुछ देर मौन साध लिया। फिर बोले— “राजन, यह अशांति निरर्थक नहीं। तुम पर स्वप्न में जो पीड़ा उतरती है, वह किसी अधूरी आत्मा का संकेत है।” ऋषि ने ध्यान लगाया। कुछ क्षण पश्चात्— “तुम्हारी पीड़ा तुम्हारी नहीं… तुम्हारे स्वर्गवासी पिता की है। उनकी आत्मा अभी प्रेत-योनि में भटक रही है— अकेली, शुष्क, अंधकार में। उन्हें तुम्हारी सहायता चाहिए।”
राजा सन्न रह गए। हृदय भारी हो गया। “मेरे पिता… प्रेत-योनि में?” उनकी आँखों में पश्चाताप जलने लगा।
पिता की आत्मा का दर्शन
ऋषि ने अग्नि प्रज्वलित की। अग्नि की लौ अचानक ऊँची उठी— लाल, तप्त, तीखी और फिर धुएँ में एक आकृति आकार लेने लगी। वह आकृति थी— राजा वैखानस के पिता, महान राजा वज्रान्क। लेकिन अब वह उसी तेज में नहीं थे— चेहरा म्लान, शरीर क्षीण, और नेत्रों में अनंत पीड़ा।
वे बोले—“पुत्र… वैखानस… मैं पिछले कर्मों से बँधा हुआ दुःखी हूँ। मुझे मुक्ति चाहिए, और मुक्ति का द्वार
केवल तुम्हारे हाथों में है।” राजा की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा— “पिताश्री, मैं क्या करूँ? कौन-सा कर्म आपको मुक्ति देगा?” वज्रान्क की आवाज काँपने लगी— “मुझे इस कालिमा से मुक्त करने के लिए
तुम्हें केवल एक ही उपाय करना होगा…”
ऋषि पाराशर का उपदेश —
मोक्षदा एकादशी का दिव्य रहस्य** अब ऋषि पाराशर बोले— “राजन, शुक्ल पक्ष की मर्गशीर्ष मास की एकादशी
मोक्ष देने वाली है। इस एकादशी का नाम है — मोक्षदा एकादशी। इसका व्रत करने से तुम्हारे पिता को मोक्ष प्राप्त होगा और यदि तुम अपने व्रत का पुण्य उनकी आत्मा को समर्पित कर दोगे, तो वे प्रेत-योनि से छूटकर स्वर्ग के द्वार में प्रवेश करेंगे।”
राजा की आँखों में आशा की रोशनी उतर आई। उन्होंने प्रणाम किया— “हे ऋषिवर, मैं इस व्रत को
अपने प्राणों से भी अधिक पवित्रता से करूँगा।”
मोक्षदा एकादशी का व्रत
एकादशी का दिन आया। चित्रावती नगरी ने आज एक अद्भुत पवित्रता धारण कर ली थी। राजा वैखानस—
• उपवास
• ध्यान
• दान
• विष्णु सहस्रनाम
• और रात्रि-जागरण
सब करते हुए हर क्षण अपने पिताश्री को याद कर रहे थे। तुलसी और चंदन की सुगंध पूरे महल में फैल रही थी।
दीपों की शृंखला मानो स्वर्ग तक रास्ता बना रही थी। राजा ने हाथ जोड़कर कहा— “हे श्रीहरि, आज के व्रत का पुण्य मैं अपने पिता वज्रांक को अर्पित करता हूँ।”
जैसे ही उन्होंने यह कहा— आकाश में एक तेज उजाला फैला।
पिता का मोक्ष —
प्रभु की चमत्कारमयी कृपा** आश्चर्य! अग्नि का प्रकाश फिर ऊँचा उठा। इस बार धुएँ में उनके पिता की वही आकृति प्रकट हुई, लेकिन अब चेहरा शांत… तेजोमय… दिव्य। उन्होंने कहा— “पुत्र वैखानस, तुम्हारे व्रत ने मेरे तमस को काट दिया। अब मैं प्रकाश-लोक की ओर जा रहा हूँ। तुम्हारा नाम अब केवल राजा नहीं—
‘पितृमुक्तिदाता’ है।”
राजा की आँखों से आँसू बहने लगे — दुःख नहीं, बल्कि उस दिव्य संतोष के जो केवल आत्मा की मुक्ति देखने पर मिलता है। राजा वज्रांक की आत्मा आकाश की ओर उठी— धीरे, तेजस्वी, शांत। कुछ ही क्षणों में वह प्रकाश में विलीन हो गई।
ऋषि पाराशर का निष्कर्ष
ऋषि पाराशर बोले— **“राजन, यही है मोक्षदा एकादशी का रहस्य। जो जीव इस व्रत को करता है, उसे न केवल स्वयं मोक्ष मिलता है, बल्कि वह दूसरों की आत्मा को भी उद्धार दे सकता है। यह संसार में सबसे श्रेष्ठ करुणा का कार्य है।”** राजा ने प्रणाम किया। उनका हृदय अब शांत था— जैसे किसी बड़े तूफ़ान के बाद सागर स्थिर हो गया हो।
मोक्षदा एकादशी का दिव्य संदेश
यह कथा मनुष्य को सिखाती है— पुत्र वही जो पिता को धन नहीं, मोक्ष दिलाए। और मन वही पवित्र जो अपने व्रत के पुण्य को किसी और की आत्मा के उद्धार को समर्पित कर सके। मोक्षदा एकादशी सिर्फ व्रत नहीं—
कर्म, करुणा, और मुक्ति का अनंत द्वार है।
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥