मार्गशीर्ष के बाद पौष की ठंडी साँझ जब नर्म चाँदनी धरती पर बिखरती है, तब देवमास की शांत लहरों में सफला एकादशी प्रकट होती है। यह वही तिथि है जब एकादशी देवी ने भक्तों को पापों से मुक्ति और धर्म के मार्ग की ओर मार्गदर्शन करने का संकल्प लिया। सफला एकादशी का व्रत केवल कर्म नहीं, बल्कि अंतरात्मा की यात्रा है—जहाँ भक्त धीरे-धीरे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर विष्णु की शरण में लौटता है।
# सफला एकादशी – पूजा-विधि (अध्यात्ममय, काव्यात्मक वर्णन)
मार्गशीर्ष के बाद पौष की ठंडी साँझ जब नर्म चाँदनी धरती पर बिखरती है, तब देवमास की शांत लहरों में सफला एकादशी प्रकट होती है। यह वही तिथि है जब एकादशी देवी ने भक्तों को पापों से मुक्ति और धर्म के मार्ग की ओर मार्गदर्शन करने का संकल्प लिया। सफला एकादशी का व्रत केवल कर्म नहीं, बल्कि अंतरात्मा की यात्रा है—जहाँ भक्त धीरे-धीरे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर विष्णु की शरण में लौटता है।
1. प्रातःकालीन शुचिता – मन और देह का पवित्रिकरण
सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठें। जैसे सूर्य की किरणें सब ओर फैलती हैं, वैसे ही आपका मन शांत और निर्मल हो। स्नान करें—गंगाजल मिलाकर। स्नान का अनुभव ऐसा हो जैसे आपके भीतर के रजोगुण और तमोगुण धुलकर केवल सात्विक प्रकाश बच गया हो। साफ, हल्के पीले या सफेद वस्त्र पहनें। इस रंग में स्वयं भगवान विष्णु की शांति और दिव्यता बसती है।
2. संकल्प – आत्मा का व्रत से संवाद
दीपक जलाकर ईशान कोण की ओर बैठें। हाथ में जल लें और मन में कहें: “हे देव, मैं आज सफला एकादशी का व्रत आपके चरणों में समर्पित करता/करती हूँ। मेरे भीतर जन्मे अधर्म, पाप और भय को नष्ट कर मुझमें धर्म, शांति और मोक्ष का प्रकाश प्रकट करें।” संकल्प वही क्षण है जब आपका लोकिक मन, देवत्व की ओर बढ़ता है।
3. मंडप और वेदी की स्थापना
• पीले वस्त्र पर छोटी वेदी तैयार करें।
• बीच में शंख, चक्र, गदा, पद्म की प्रतीक स्थापना।
• विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर रखें।
• तुलसी दल, पीले फूल, दीपक, अगरबत्ती और कपूर सजाएँ।
• एक थाली में अक्षत (चावल), रोली, गंगाजल रखें।
• दूसरी थाली में फल, पंचामृत, गुड़, सूखे मेवे रखें।
वेदी की रचना ऐसा हो जैसे आप स्वयं वैकुंठ के द्वार पर पूजा सजाएँ।
4. दीप-प्रज्वलन – अंधकार से प्रकाश की ओर
दीपक जलाएँ। दीपक की लौ से अनुभव करें कि आपके पाप, संशय और भय, लौ की ऊष्मा में पिघल रहे हैं। मन में कहें: “यह दीप मेरे भीतर जन्मी एकादशी देवी को समर्पित है।”
5. आह्वान – एकादशी देवी और विष्णु की उपस्थिति
सुगंधित धूप जलाएँ। मंत्र उच्चारण करें (धीमी, नादमयी ध्वनि में):
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ विष्णवे नमः”
अब स्मरण करें:
“हे देवी, आप जो अधर्म का नाश करती हैं, विष्णु की प्रिय ऊर्जा हैं, आज मेरी चेतना में प्रकट हों।”
6. अभिषेक और अर्पण
यदि प्रतिमा हो—हल्के गंगाजल से स्नान कराएँ।
क्रमशः अर्पण करें:
1. गंगाजल
2. पंचामृत
3. चंदन
4. अक्षत
5. फूल
6. तुलसी
तुलसी अर्पित करते समय कहें: “विष्णु-प्रिया तुलसी, मेरी भक्ति को स्वीकार कर इसे विष्णु चरणों तक पहुँचाओ।”
7. कथा-पाठ – एकादशी देवी के जन्म की स्मृति
शांत मन से सफला एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। कथा का स्मरण वह क्षण है जब आप अपने भीतर धर्म की उसी जन्म-ऊर्जा का अनुभव करते हैं।
8. विष्णु सहस्रनाम / भगवद्गीता
यदि संभव हो, विष्णु सहस्रनाम का पाठ श्रेष्ठ माना गया है। समय कम हो तो—गीता, भक्ति योग (अध्याय 12) पढ़ें। इस पाठ के बाद अनुभव करें कि भगवान स्वयं भीतर बैठे हैं।
9. भोग और आरती
भोग अर्पित करें:
• खीर
• सूखे मेवे
• गुड़
• फल
• तुलसी
फिर शांत, सौम्य आरती करें। मन में कहें: “जैसे यह दीप अंधकार हर रहा है, वैसे ही मेरे भीतर के अधर्म, भ्रम, भय और अज्ञान का अंत हो।”
10. व्रत नियम
• दिनभर सात्त्विक रहें।
• नमक, तामसिक आहार, नकारात्मक विचार न रखें।
• शरीर सक्षम हो तो पूर्ण उपवास।
• अन्यथा फलाहार या केवल जल।
11. रात्रि-जागरण
क्योंकि यही रात एकादशी देवी का प्राकट्य हुई, हल्का जागरण करें। मंत्र जपें: “ॐ नमो नारायणाय” , रात गहराती है, ईश्वर की शांति और भी गहन होती है।
12. द्वादशी पारण
अगली सुबह:
• तुलसी जल से भगवान को स्नान कराएँ।
• साधारण सात्त्विक भोजन ग्रहण करें।
मन में कहें: “आज का व्रत मेरी आत्मा को धर्म के प्रकाश से भर दे, मेरे जीवन से अधर्म की छाया सदा के लिए मिट जाए।”
आध्यात्मिक सार
सफला एकादशी व्रत केवल कर्म नहीं, यह आत्मा की यात्रा है। यह दिन याद दिलाता है कि: “हम केवल शरीर नहीं, बल्कि शाश्वत आत्मा हैं, जो ईश्वर की ओर लौटने की यात्रा पर हैं।”
#पौष कृष्ण सफला एकादशी कथा:
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
एक समय की बात है—राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करते हुए विनम्र भाव से पूछा:
“हे जनार्दन! हे मधुसूदन! कृपा करके मुझे पौष कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम, उसकी विधि, तथा उसका फल बताने की कृपा करें। विनाशकारी पापों से परेशान मनुष्य इस व्रत के द्वारा कैसे मुक्त हो सकता है?” भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले— “हे धर्मराज! यह एकादशी अत्यंत पावन और पापों का सर्वनाश करने वाली है। इसका नाम है — सफला। जिसने भी श्रद्धा से इसका व्रत किया, उसे दुख, दरिद्रता, और दुर्भाग्य से मुक्ति मिलती है। इसके प्रभाव से निर्फल जीवन भी सफल हो जाता है।” फिर भगवान श्रीकृष्ण कथा सुनाने लगे—
प्राचीन काल में चंपावती नगरी में महीष्मान ( Mahishmaan) एक धर्मपरायण राजा राज्य करता था। राजा न्यायप्रिय, दयालु और प्रजा–वत्सल था। उसकी सेना, मंत्री और प्रजा—सब उससे प्रसन्न थे। किंतु राजा के हृदय में एक गहरी चिंता थी, क्योंकि उसका ज्येष्ठ पुत्र ‘लूम्बक’ अत्यंत दुष्ट, क्रूर, अधर्मी और पापी स्वभाव का था।
वह दिन–रात पाप कर्मों में लिप्त रहता— चोरी करना, मद्यपान, जुआ, बलात्कार, रिश्वत लेना, हिंसा करना—उसके लिए खेल जैसा था। राजा के समझाने पर भी वह कभी नहीं सुधरता।
एक दिन नगरवासियों ने रोते हुए राजा के सामने गुहार लगाई: “महाराज! आपका पुत्र लोम्बक हमारी नारियों का, धन का और मान–सम्मान का नाश कर रहा है। यदि आपने रोक न लगाई तो हम सब राज्य छोड़ देंगे।” इन बातों ने राजा के हृदय को झकझोर दिया। राजा ने गहरी पीड़ा से भरी आवाज़ में कहा:
“एक राजा का धर्म है कि वह न्याय करे, चाहे उसके सामने अपना पुत्र ही क्यों न खड़ा हो।”
अगली ही सुबह, राजदरबार में सभा बुलाकर राजा ने कठोर निर्णय सुनाया— “आज से लूम्बक राजकुमार नहीं रहेगा। इसे राज्य से निर्वासित किया जाता है।” राजा का यह निर्णय सुनकर पूरा दरबार स्तब्ध हो गया, परंतु न्याय की विजय हुई। लूम्बक को वन में भेज दिया गया।
*वन में पापों का भोग और पतन
वन में निराश, भूखा और रोगी होकर, लूम्बक ठंड और दुख से कांप रहा था। धीरे–धीरे उसके शरीर में शक्ति कम होने लगी और वह भूख से बेहाल होकर रोने लगा। उसने सोचा: “मेरे सारे कष्टों का कारण मैं स्वयं हूँ।
मैंने अपने पापों से सबका दिल दुखाया, आज मैं उसी का फल भोग रहा हूँ।” वह वहीं रोता हुआ एक वृक्ष के नीचे, मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए लेट गया। उसी दिन Paush Krishna Ekadashi का शुभ दिन था।
*अचानक दिव्य संयोग
रात भर भयंकर पीड़ा में पड़े हुए, न भूख का ध्यान, न प्यास का। इस प्रकार बिना इच्छा के उसने निर्जल उपवास कर लिया — भगवान कहते हैं — “Ekadashi की केवल एक रात्रि का उपवास भी मनुष्य के अनेकों जन्मों के पाप मिटा देता है।” सुबह होने पर निकट के ब्राह्मणों ने उस वृक्ष के नीचे आकर पूजा के लिए फल, पुष्प, तुलसी, जल, दीप अर्पित किया और चले गए। लूम्बक ने कमजोरी में काँपते हाथों से वही फल उठाए और रोते हुए बोला— “हे नारायण! यदि आप सच में सबके रक्षक हैं, तो मुझे क्षमा करें।” उसकी पश्चाताप की पुकार सुनकर स्वयं श्री विष्णु प्रकट हुए।
*भगवान विष्णु की कृपा
भगवान बोले: “हे लूम्बक! आज तूने अनजाने में पावन ‘सफला एकादशी’ का व्रत किया, इसलिए तेरे सारे पाप नष्ट हो गए। अब तू पुण्यात्मा बनकर अपने पिता के पास लौट जा।” इतना सुनते ही लूम्बक का शरीर तेज से भर गया, उसका हृदय पवित्र हो गया और वह प्रकाशमय रूप में परिवर्तित होकर भगवान को प्रणाम करके वापस नगर गया। राजा ने पुत्र को बदलते हुए देखकर प्रसन्न होकर गले से लगा लिया। राजा और प्रजा ने सफला एकादशी का उत्सव बड़े हर्ष के साथ मनाया। लोम्बक आगे चलकर अत्यंत धर्मी और दानशील राजा बना और अनेक मंदिर बनवाए।
फलश्रुति:
जो भक्त श्रद्धापूर्वक यह व्रत और कथा सुनता है —उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, दुर्भाग्य सौभाग्य में बदलता है, संतान का कष्ट दूर होता है , रुके हुए काम सफल होते हैं , मृत्युभय मिटता है ,घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है!
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥