पौष मास की उजली प्रभात बेला…जब शीतल वायु में पवित्रता घुली होती है और आकाश में सूर्यदेव मृदु किरणों से धरती का आलिंगन करते हैं, उसी पावन समय पुत्रदा एकादशी का प्राकट्य होता है।
यह वह दिव्य तिथि है जो केवल संतान-सुख ही नहीं, बल्कि वंश-धर्म, पितृ-तृप्ति और आत्मिक उत्तरदायित्व का स्मरण कराती है।
पुत्रदा एकादशी का व्रत कोई साधारण कामना-व्रत नहीं— यह वह आध्यात्मिक साधना है जिसमें साधक अपने जीवन की धारा को भगवान विष्णु के चरणों की ओर मोड़ देता है।
# पुत्रदा एकादशी – पूजा-विधि
पौष मास की उजली प्रभात बेला…जब शीतल वायु में पवित्रता घुली होती है और आकाश में सूर्यदेव मृदु किरणों से धरती का आलिंगन करते हैं, उसी पावन समय पुत्रदा एकादशी का प्राकट्य होता है।
यह वह दिव्य तिथि है जो केवल संतान-सुख ही नहीं, बल्कि वंश-धर्म, पितृ-तृप्ति और आत्मिक उत्तरदायित्व का स्मरण कराती है।
पुत्रदा एकादशी का व्रत कोई साधारण कामना-व्रत नहीं— यह वह आध्यात्मिक साधना है जिसमें साधक अपने जीवन की धारा को भगवान विष्णु के चरणों की ओर मोड़ देता है।
1. प्रातःकालीन शुचिता – देह, मन और स्मृति का पवित्रीकरण
एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठें। जब रात्रि का अंधकार धीरे-धीरे पीछे हट रहा हो और प्रकाश जन्म ले रहा हो, तभी साधक को भी अपने भीतर के अज्ञान को विदा करना चाहिए। गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें। जल का स्पर्श ऐसा अनुभव कराए मानो जन्म-जन्म के पाप, वंशगत दोष और पितृ-ऋण धीरे-धीरे धुलकर शांत हो रहे हों।
स्नान के पश्चात स्वच्छ, सात्त्विक पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। इन रंगों में स्वयं भगवान नारायण की शांति और करुणा वास करती है।
2. संकल्प – आत्मा का व्रत से संवाद
पूजा-स्थान को स्वच्छ करें। ईशान कोण या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। दीपक प्रज्वलित करें। हाथ में जल लें और हृदय में इस प्रकार भाव करें—
“हे जगन्नाथ! आज पौष शुक्ल एकादशी के पावन दिन मैं पुत्रदा एकादशी का व्रत आपके चरणों में समर्पित करता/करती हूँ। यदि मेरे जीवन में वंश, संतान या धर्म से जुड़ा कोई भी अवरोध हो, तो उसे अपनी कृपा से शांत करें। यह व्रत संतान-सुख, कुल-कल्याण, पितृ-तृप्ति और आत्मिक शुद्धि हेतु है।”
संकल्प वही क्षण है जब साधक का लोकिक मन धीरे-धीरे देवत्व की ओर अग्रसर होता है।
3. मंडप और वेदी की स्थापना
पीले वस्त्र पर एक छोटी, पवित्र वेदी सजाएँ। बीच में भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। साथ में रखें—
• शंख
• चक्र
• गदा
• पद्म
• तुलसी दल, पीले पुष्प, धूप, दीप और कपूर सजाएँ।
ऐसा अनुभव करें मानो आपके गृह-आंगन में क्षण भर के लिए वैकुंठ अवतरित हो गया हो।
4. दीप-प्रज्वलन – अंधकार से प्रकाश की ओर
घी का दीपक जलाएँ। दीपक की लौ को निहारते हुए मन में कहें— “हे नारायण! जैसे यह दीप अंधकार को हरता है, वैसे ही मेरे जीवन से वंश-दुःख, भय, अशांति और दोष दूर हों।” दीपक केवल प्रकाश नहीं, आपकी चेतना का प्रतीक है।
5. आह्वान – एकादशी देवी और विष्णु की उपस्थिति
सुगंधित धूप जलाएँ। धीमी, नादमयी ध्वनि में मंत्र जपें— “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ नमो नारायणाय” प्रत्येक मंत्र के साथ यह अनुभव करें कि हृदय का भार हल्का हो रहा है। अब भावपूर्वक स्मरण करें—
“हे एकादशी देवी, हे विष्णु-प्रिया शक्ति, आज मेरी चेतना में प्रकट हों और इस व्रत को सफल करें।”
6. अभिषेक और अर्पण
यदि प्रतिमा हो, तो हल्के गंगाजल से स्नान कराएँ। क्रमशः अर्पण करें—
• गंगाजल
• पंचामृत
• चंदन
• अक्षत
• पुष्प
• तुलसी दल
तुलसी अर्पण करते समय कहें— “विष्णु-प्रिया तुलसी, मेरी भक्ति को शुद्ध कर इसे भगवान के चरणों तक पहुँचाओ।”
7. कथा-पाठ – पुत्रदा एकादशी की स्मृति
अब शांत, स्थिर चित्त से पुत्रदा एकादशी की व्रत-कथा पढ़ें या सुनें। कथा वह सेतु है जो कर्म को फल से जोड़ता है। कथा पढ़ते समय मन में यही भाव रखें— “मैं केवल सुन नहीं रहा/रही, मैं इस कथा का भाग बन रहा/रही हूँ।”
8. विष्णु सहस्रनाम / भगवद्गीता
यदि संभव हो, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। समय अल्प हो तो— श्रीमद्भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय (भक्ति योग) पढ़ें। इस पाठ के पश्चात हृदय में एक गहन शांति उतरती है— जैसे भगवान स्वयं भीतर विराजमान हो गए हों।
9. भोग और आरती
भगवान को सात्त्विक भोग अर्पित करें—
• खीर
• फल
• गुड़
• सूखे मेवे
• तुलसी
इसके बाद शांत, सौम्य आरती करें। मन में कहें— “जैसे यह दीप अंधकार हर रहा है, वैसे ही मेरे भीतर के अधर्म, भय, भ्रम और अज्ञान का अंत हो।”
10. व्रत-नियम
दिनभर सात्त्विक रहें। कटु वचन, क्रोध और नकारात्मक विचार से दूर रहें। शरीर सक्षम हो तो पूर्ण उपवास रखें।
अन्यथा फलाहार या केवल जल। यह व्रत शरीर से अधिक मन का उपवास है।
11. रात्रि-जागरण – साधना की पूर्णता
रात्रि में हल्का जागरण करें। मंत्र जपें— “ॐ नमो नारायणाय” जैसे-जैसे रात्रि गहराती है, वैसे-वैसे भीतर ईश्वर की शांति और अधिक स्थिर होती जाती है।
12. द्वादशी पारण
अगली सुबह तुलसी मिश्रित जल से भगवान को स्नान कराएँ। साधारण, सात्त्विक भोजन से व्रत का पारण करें। मन में कहें— “हे प्रभु, इस व्रत को मेरी आत्मा का संस्कार बनाइए और मेरे कुल में धर्म, शांति और प्रकाश बनाए रखिए।”
आध्यात्मिक सार : पुत्रदा एकादशी
केवल संतान की कामना नहीं— यह स्मरण है कि— “संतान शरीर से नहीं, संस्कार और धर्म से पुष्ट होती है।” जो इस व्रत को श्रद्धा और भाव से करता है, उसके जीवन में केवल संतान ही नहीं, शांति और संतुलन भी जन्म लेते हैं।
# पुत्रदा एकादशी व्रत-कथा
(पौष शुक्ल एकादशी )
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
मंगलाचरण
ॐ नमो नारायणाय। श्रीहरि विष्णु के चरणकमलों में नमन है— जो सृष्टि के आधार हैं, जो पितरों के तारक हैं,
जो संतानों के दाता और दुःखों के हर्ता हैं।
युधिष्ठिर–श्रीकृष्ण संवाद
धर्मराज युधिष्ठिर, जो स्वयं धर्म के मूर्तिमान स्वरूप थे, एक दिन द्वारका में श्रीकृष्ण के चरणों में बैठे। मन में लोककल्याण की चिंता थी। नेत्रों में करुणा थी। युधिष्ठिर बोले— “हे केशव! इस संसार में ऐसे असंख्य जीव हैं जिनके घर सूने हैं, जिनकी गोद रिक्त है, जिनके पितृ लोक में आँसू बहते हैं। कृपा कर वह व्रत बताइए जिससे संतान की प्राप्ति हो, पितृ तृप्त हों और वंश धर्म में स्थित रहे।”
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराए— वह मुस्कान जो अज्ञान को चीर देती है। श्रीकृष्ण बोले— “राजन्! पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पुत्रदा कहलाती है। यह व्रत केवल पुत्र देने वाला नहीं, बल्कि पूर्वजन्म के दोषों को भस्म करने वाला है।”
भद्रावती नगरी : उस काल में भद्रावती नाम की एक रमणीय नगरी थी। जहाँ— नदियाँ कलकल करती थीं, मंदिरों में घण्टानाद गूँजता था, प्रजा धर्म में रमी रहती थी उस नगरी के राजा थे सुकर्मा। राजा सुकर्मा धर्मशील थे,
दानशील थे, परंतु हृदय में एक अग्नि जलती रहती—संतान का अभाव। रानी शैब्या प्रति रात्रि दीपक के सम्मुख बैठकर भगवान से एक ही याचना करती— “हे नारायण! यदि पुत्र न भी दो तो मुझे इस वेदना को सहने की शक्ति दो।”
राजा का वन-गमन
एक दिन राजा मौन धारण कर वन की ओर चले। वन में शीतल वायु थी, तपस्वियों का आश्रम था। वहाँ एक वृद्ध मुनि तप में लीन थे। उनका तेज सूर्य समान था। राजा ने दंडवत किया। मुनि बोले— “राजन्, तुम्हारे नेत्रों में चिंता का भार है। सत्य कहो।” राजा ने अपना हृदय खोल दिया।
ऋषि का उपदेश
मुनि बोले— “हे राजन्! यह दुःख कर्मजन्य है। परंतु भगवान विष्णु के चरणों में कर्म भी हार जाते हैं। तुम पुत्रदा एकादशी का व्रत करो। व्रत में संयम रखो, रात्रि जागरण करो, कथा श्रवण करो।”
व्रत का प्रभाव
राजा-रानी ने पूर्ण श्रद्धा से व्रत किया। नगर में हरिनाम गूँज उठा। रात्रि में दीपक जलते रहे। कुछ समय पश्चात
रानी गर्भवती हुईं। नवजात शिशु के जन्म के साथ जैसे पूरे राज्य का भाग्य बदल गया।
श्रीकृष्ण बोले— “राजन्! जो इस व्रत को श्रद्धा से करता है उसे संतान, यश और मोक्ष प्राप्त होता है। यह व्रत
गृहस्थ के लिए वरदान और पितरों के लिए तृप्ति है।”
फलश्रुति
जो भक्त श्रद्धा से पुत्रदा एकादशी की कथा पढ़ता या सुनता है— उसके कुल में कभी संतान-विच्छेद नहीं होता,
पितृ दोष शांत होते हैं और अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। पुत्रदा एकादशी सिर्फ पुत्र पाने का व्रत नहीं—
यह वंश, धर्म और उत्तरदायित्व का स्मरण है। “संतान वही सार्थक है जो धर्म के मार्ग पर चले।”
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥