षट्तिला एकादशी वह पुण्यकाल है, जब सूक्ष्म कर्म-बीज (तिल) दान, तप और भक्ति द्वारा पाप से पुण्य और अंधकार से प्रकाश में परिवर्तित हो जाते हैं। यह व्रत केवल स्वयं के लिए नहीं, पितरों, भूली हुई आत्माओं और कर्मबंधन में फँसी चेतना के लिए भी किया जाता है।
षट्तिला एकादशी – संपूर्ण पूजा-विधि
(पाप-क्षय, पितृ-शांति और दरिद्रता-नाश की दिव्य तिथि)
षट्तिला एकादशी वह पुण्यकाल है, जब सूक्ष्म कर्म-बीज (तिल) दान, तप और भक्ति द्वारा पाप से पुण्य और अंधकार से प्रकाश में परिवर्तित हो जाते हैं। यह व्रत केवल स्वयं के लिए नहीं, पितरों, भूली हुई आत्माओं और कर्मबंधन में फँसी चेतना के लिए भी किया जाता है।
1. प्रातः स्नान व शुचिता — कर्म-मल के क्षय का प्रथम चरण
• ब्रह्ममुहूर्त में जागें
• स्नान-जल में काले तिल + गंगाजल मिलाएँ
• शुद्ध वस्त्र धारण करें (सफेद / पीला / हल्का वस्त्र)
• स्नान करते समय मन में भाव रखें—
“आज मैं अपने और अपने पितरों के कर्म-बीजों को शुद्ध करने जा रहा/रही हूँ।” यह स्नान केवल शरीर का नहीं,
पूर्वजन्मों से चले आ रहे ऋण और संस्कारों का क्षालन है।
2. संकल्प — जब आत्मा प्रायश्चित स्वीकार करती है
पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर, हथेली में जल, तिल और अक्षत लें।
संकल्प-भाव —
“मैं माघ कृष्ण षट्तिला एकादशी का व्रत समस्त पाप-क्षय, पितृ-शांति, दरिद्रता-नाश एवं श्रीहरि-कृपा हेतु करता/करती हूँ। हे नारायण, मेरे इस व्रत का पुण्य समस्त ज्ञात-अज्ञात पितरों को प्राप्त हो।”
• संकल्प वह क्षण है जब अहंकार झुकता है और करुणा जागती है।
3. वेदी की स्थापना — पितृलोक और वैकुण्ठ का संगम
स्वच्छ आसन पर—
• श्रीविष्णु / नारायण का चित्र
• तुलसी
• शंख
• दीपक
• गंगाजल
• काले तिल
• चंदन
• सफेद/पीले पुष्प
• फल / गुड़ / तिल से बना भोग
वेदी को ऐसे सजाएँ मानो भगवान पितरों के साथ पधारने वाले हों।
4. दीप-प्रज्वलन — पितृलोक में प्रकाश का आह्वान
घी का दीप जलाकर कहें— “हे प्रभु, जैसे यह दीप अंधकार हरता है, वैसे ही मेरे पितरों की योनियों का अंधकार नष्ट हो।”
षट्तिला एकादशी में दीप पितरों तक सीधा प्रकाश पहुँचाने वाला माध्यम माना गया है।
5. आचमन एवं अंतःशुद्धि
गंगाजल से आचमन करते हुए भाव रखें— “मेरे विचार, वाणी और कर्म आज शुद्धि और दान के लिए समर्पित हैं।”
6. श्रीविष्णु का आवाहन — पितृमित्र का आह्वान
‘ॐ नमो नारायणाय’ का जप करते हुए ध्यान करें—
“हे श्रीहरि, आप ही पितृदेव हैं, आप ही कर्मों के साक्षी हैं। आज मेरी भक्ति को पितृ-उद्धार का माध्यम बनाइए।”
7. विष्णु पूजन — तिल द्वारा कर्म-शुद्धि
क्रम से पूजन करें—
1. गंगाजल अर्पण
2. अक्षत, चंदन
3. पुष्प अर्पण
4. तुलसी दल
5. धूप–दीप
6. तिल से बना नैवेद्य
7. जल अर्पण
पूजन के समय भाव रखें— “मेरे हर अर्पण से कोई न कोई आत्मा तृप्त हो रही है।”
8. षट्तिला विधान — तिल के छह दिव्य प्रयोग
यही इस एकादशी का प्राण है—
① तिल-स्नान — कर्म-मल नाश
② तिल-उबटन — रोग व दोष क्षय
③ तिल-हवन — देव व पितृ तृप्ति
④ तिल-दान — दरिद्रता व ऋण नाश
⑤ तिल-भोजन — पाप-क्षालन
⑥ तिल-तर्पण — पितृ-शांति
यह छह क्रियाएँ छह जन्मों के कर्म-बंधन काटने वाली मानी गई हैं।
9. कथा-स्मरण — चेतना का संस्कार
षट्तिला एकादशी की कथा (ब्राह्मण स्त्री और विष्णु उपदेश) अवश्य पढ़ें/सुनें।
कथा वह सेतु है जो कर्म से करुणा की ओर ले जाता है।
10. पितरों हेतु पुण्य-समर्पण (मुख्य रहस्य)
घी का दीप लेकर कहें—
“हे नारायण, मेरे इस व्रत, दान, उपवास और पूजा का संपूर्ण पुण्य मेरे समस्त पितरों एवं भूली हुई आत्माओं को समर्पित है। उन्हें शांति, तृप्ति और सद्गति प्राप्त हो।”
• यही वह क्षण है जब षट्तिला एकादशी जीवित हो उठती है।
11. रात्रि-जागरण — कर्म-बंधन का क्षय
रात में कम से कम 1 घंटा— ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ यह जागरण पितरों की भूख और पीड़ा को शांत करने वाला माना गया है।
12. द्वादशी पारण — शांति की पूर्णता
द्वादशी सूर्योदय के बाद—
• तिल-जल से आचमन
• सात्त्विक भोजन
• अंत में प्रार्थना—
“हे श्रीहरि, आज के व्रत का फल समस्त पितरों को प्राप्त हो।”
षट्तिला एकादशी का आध्यात्मिक सार
• यह व्रत पितृ-दोष शांति का सर्वोत्तम साधन है
• दरिद्रता, ऋण और कर्म-बंधन काटता है
• दान और करुणा का वास्तविक अर्थ सिखाता है
• मनुष्य को पूर्वजों से जोड़कर आशीर्वाद दिलाता है
# षट्तिला एकादशी – कथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
माघ मास की वह रात्रि थी। ठंडी हवाओं में एक अजीब-सी शुष्कता थी — जैसे धरती भी किसी पुराने ऋण को याद कर रही हो। आकाश स्वच्छ था, पर तारे मानो मौन थे। इसी मौन में एक आत्मा भटक रही थी… न स्वर्ग की ओर, न पृथ्वी की ओर।
• यह कथा है दान, तिल और करुणा की।
ब्राह्मण स्त्री का कठोर तप
किसी समय, किसी नगर में एक अत्यंत धर्मपरायण ब्राह्मण स्त्री रहती थी। वह —
• नित्य व्रत करती
• देवताओं की पूजा करती
• एकादशी, प्रदोष, अमावस्या— कोई तिथि न छोड़ती
उसका जीवन बाहर से उज्ज्वल था, पर भीतर कहीं एक सूक्ष्म कठोरता छिपी थी। वह दान तो करती थी —
पर केवल जल का। अन्न, तिल, धन — कुछ नहीं। मन में यह भाव था— “मैं स्वयं तप करती हूँ, दूसरों को क्यों दूँ?”
मृत्यु के बाद — शून्य का लोक
कालचक्र घूमा। एक दिन वह स्त्री देह त्याग गई। पर —
• न स्वर्ग मिला
• न पितृलोक
• न पुनर्जन्म
वह एक निर्जन, शुष्क, अन्नहीन लोक में पहुँच गई। न वहाँ सूर्य था, न चंद्रमा, न छाया। भूख थी — पर भोजन नहीं। प्यास थी — पर जल नहीं। तभी उस आत्मा ने विलाप किया— “हे नारायण… मैंने जीवनभर पूजा की,
फिर यह शून्य क्यों?”
भगवान विष्णु का प्राकट्य
अचानक उस शून्य में एक नील प्रकाश फूटा। चार भुजाओं वाला तेज प्रकट हुआ — भगवान विष्णु। उन्होंने करुण स्वर में कहा— “वत्से, तुमने भक्ति की, पर दान नहीं किया। तुम्हारे कर्मों में तप था, पर करुणा नहीं।” स्त्री काँप उठी— “हे प्रभु… क्या अब मेरे लिए कोई उपाय नहीं?”
षट्तिला एकादशी का रहस्य
भगवान बोले— “माघ मास, कृष्ण पक्ष की एकादशी ‘षट्तिला एकादशी’ कहलाती है। उस दिन यदि तिल का छः प्रकार से प्रयोग किया जाए— तो सबसे कठोर कर्म भी गल जाते हैं।” भगवान ने कहा— “तिल कर्मों के सूक्ष्म बीज हैं। जो उन्हें दान, तर्पण और त्याग में बदल देता है, वह जन्म-जन्म का ऋण काट देता है।”
पृथ्वी पर पुनः अवसर
भगवान की कृपा से उस आत्मा को एक अद्भुत अवसर मिला। पृथ्वी पर एक साधक ने —
• माघ कृष्ण षट्तिला एकादशी का व्रत किया
• तिल का दान, हवन और तर्पण किया
• और अंत में कहा—
“इस व्रत का पुण्य सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों और भूली हुई आत्माओं को समर्पित है।”
कर्म-बंधन का टूटना
जैसे ही वह पुण्य-समर्पण हुआ — उस सूने लोक में पहली बार वर्षा हुई। भूखी आत्मा को अन्न का स्पर्श मिला। अंधकार में दीप जला। भगवान विष्णु पुनः प्रकट हुए— अब उनके साथ पितृगण भी थे। विष्णु ने कहा— “वत्से,
अब तुम्हारे कर्म गल चुके हैं। दान ने तप को पूर्ण कर दिया है।”
मुक्ति का क्षण
वह आत्मा रो पड़ी — इस बार पीड़ा से नहीं, कृतज्ञता से। धीरे-धीरे वह उस शुष्क लोक से उठी, और पितृलोक की ओर अग्रसर हुई। आकाश में शब्द गूँजा— “षट्तिला एकादशी दान से मोक्ष का मार्ग खोलती है।”
भगवान विष्णु का अंतिम वचन
भगवान बोले— “जो जीव षट्तिला एकादशी करता है, वह केवल स्वयं नहीं— दूसरों की आत्मा का भी ऋण उतारता है। यह एकादशी करुणा से जन्मी, दान से पली और मोक्ष तक पहुँचाने वाली है।”
षट्तिला एकादशी का दिव्य संदेश
यह कथा सिखाती है—
• केवल पूजा पर्याप्त नहीं
• केवल तप अधूरा है
• दान ही भक्ति को पूर्ण करता है
तिल छोटा है, पर उसका पुण्य असीम है। षट्तिला एकादशी कर्म, करुणा और पितृ-उद्धार तीनों का संगम है।
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥