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विजया एकादशी

विजया एकादशी वह दिव्य अवसर है जब धर्म, सत्य और धैर्य अधर्म, भय और विघ्नों पर विजय प्राप्त करते हैं।
यह व्रत केवल सफलता के लिए नहीं, बल्कि धर्मपूर्ण विजय के लिए किया जाता है।

विजया एकादशी – संपूर्ण पूजा-विधि
(शत्रु-विनाश, बाधा-नाश और धर्म की विजय की तिथि)
विजया एकादशी वह दिव्य अवसर है जब धर्म, सत्य और धैर्य अधर्म, भय और विघ्नों पर विजय प्राप्त करते हैं।
यह व्रत केवल सफलता के लिए नहीं, बल्कि धर्मपूर्ण विजय के लिए किया जाता है।
1. प्रातः स्नान व शुचिता — विजय की भूमि तैयार करना
• ब्रह्ममुहूर्त में जागें
• स्नान-जल में गंगाजल या तिल मिलाएँ
• स्वच्छ वस्त्र (पीला / केसरिया / सफेद) धारण करें
• स्नान करते समय भाव रखें—
“आज मैं अपने जीवन के समस्त विघ्नों पर धर्म की विजय हेतु स्वयं को शुद्ध कर रहा/रही हूँ।”
यह स्नान मन, शरीर और संकल्प — तीनों की तैयारी है।
2. संकल्प — धर्मयुक्त विजय का व्रत
पूर्व दिशा में शांत होकर बैठें। हथेली में जल, अक्षत और पुष्प लें।
संकल्प-भाव — “मैं फाल्गुन कृष्ण विजया एकादशी का व्रत शत्रु-बाधा नाश, भय-क्षय, धर्म-विजय एवं श्रीहरि-कृपा हेतु करता/करती हूँ। हे प्रभु, मेरी विजय अहंकार नहीं— धर्म और न्याय की हो।”
विजया एकादशी में संकल्प की शुद्धता सबसे महत्त्वपूर्ण है।
3. वेदी की स्थापना — धर्म का सिंहासन
स्वच्छ आसन पर—
• भगवान विष्णु / श्रीराम का चित्र
• शंख, चक्र
• तुलसी
• घी का दीपक
• धूप
• गंगाजल
• पीले पुष्प
• फल / गुड़ / सात्त्विक भोग
वेदी को ऐसे सजाएँ मानो धर्म स्वयं सिंहासन पर विराजमान हो।

4. दीप-प्रज्वलन — अधर्म पर पहला प्रकाश
घी का दीप जलाकर कहें— “हे श्रीहरि, जैसे यह दीप अंधकार काटता है, वैसे ही मेरे जीवन के सभी अधर्मिक विघ्न कट जाएँ।” विजया एकादशी में दीप धर्म-तेज का प्रतीक है।
5. आचमन एवं अंतःशुद्धि
गंगाजल से आचमन करते हुए भाव रखें— “मेरे विचार, वाणी और कर्म आज धर्म के अधीन हों।”
6. श्रीविष्णु / श्रीराम का आवाहन — विजय के अधिपति
‘ॐ नमो नारायणाय’ या
‘ॐ श्रीरामाय नमः’ का जप करते हुए ध्यान करें—
“हे प्रभु, आप ही मर्यादा हैं, आप ही विजय हैं। मेरी प्रत्येक परीक्षा में आप मेरे साथ चलें।”
7. विष्णु पूजन — शत्रु-बाधा क्षय
क्रम से पूजन करें—
1. गंगाजल अर्पण
2. अक्षत व चंदन
3. पुष्प अर्पण
4. तुलसी-दल
5. धूप–दीप
6. नैवेद्य
7. जल अर्पण
पूजन-भाव— “मेरी हर जीत आपके चरणों की देन है।”
8. विशेष मंत्र-जप — विजय सिद्धि
विजया एकादशी पर विशेष रूप से— 108 या 1008 बार (क्षमता अनुसार)
• ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
• ॐ श्रीरामाय नमः
यह जप शत्रु-बाधा, मुकदमे, विरोध और भय को शांत करता है।
9. कथा-स्मरण — विजय का संस्कार
विजया एकादशी की कथा (भगवान श्रीराम द्वारा लंका-विजय से पूर्व यह व्रत) अवश्य पढ़ें/सुनें। कथा
संकल्प को सिद्धि में बदलने की कुंजी है।
10. रात्रि-जागरण — विजय का गुप्त क्षण
रात में कम से कम एक घंटा—
• हरिनाम-स्मरण
• राम-नाम
• मौन ध्यान
भाव रखें— “हे प्रभु, मेरी विजय आपके चरणों में पूर्ण हो।”
11. द्वादशी पारण — विजय का संस्कार
द्वादशी सूर्योदय के बाद—
• भगवान को भोग
• सात्त्विक भोजन
• अंत में प्रार्थना—
“हे श्रीहरि, मेरी विजय सदा धर्मयुक्त बनी रहे।”
विजया एकादशी का आध्यात्मिक सार
• यह व्रत धर्मपूर्ण सफलता देता है
• शत्रु-बाधा, केस, विरोध में सहायक
• आत्मबल और धैर्य बढ़ाता है
• अहंकार रहित विजय सिखाता है
विजया एकादशी का दिव्य संदेश
जो विजय धर्म से जुड़ी हो, वही सच्ची विजय है। विजया एकादशी धर्म की उसी विजय की स्मृति है।
विजया एकादशी व्रत-कथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
(धर्म की विजय की अमर कथा)
प्राचीन काल की बात है। जब भगवान श्रीराम माता सीता की खोज में लंका की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब उनके मार्ग में अपरिमित विघ्न और भय उपस्थित थे। समुद्र अथाह था, शत्रु अत्यंत बलवान, और समय अत्यंत कठोर। सेनापति, वानर और स्वयं लक्ष्मण भी चिंता में डूबे हुए थे। तब श्रीराम ने विचार किया— “धर्म का मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु विजय का मूल भी वही है।”
ऋषि बकदाल्भ्य का आगमन
उसी समय महान तपस्वी ऋषि बकदाल्भ्य श्रीराम की सेना के पास आए। श्रीराम ने विनम्रतापूर्वक पूछा—
“हे मुनिवर, इस कठिन कार्य में धर्मपूर्वक विजय कैसे प्राप्त हो?” ऋषि मुस्कराए और बोले— “हे रघुनाथ,
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है। इस दिन किया गया व्रत असंभव को भी संभव बना देता है।”
विजया एकादशी का विधान
ऋषि ने कहा— “जो मनुष्य इस एकादशी को श्रद्धा और नियम से करता है, वह शत्रुओं पर विजय पाता है, भय से मुक्त होता है और अंततः धर्म में स्थिर होता है।” उन्होंने बताया—
• ब्रह्ममुहूर्त में स्नान
• शुद्ध संकल्प
• भगवान विष्णु / श्रीराम का पूजन
• उपवास और रात्रि-जागरण
• द्वादशी को विधिपूर्वक पारण
भगवान श्रीराम द्वारा व्रत
भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण और वानर सेना सहित विजया एकादशी का व्रत किया। पूरी सेना ने—
• उपवास रखा
• हरिनाम का जप किया
• रात्रि में जागरण किया
श्रीराम ने प्रार्थना की— “हे नारायण, मेरी यह विजय अहंकार की नहीं, धर्म की हो।”
व्रत का फल — लंका-विजय
व्रत के प्रभाव से—
• समुद्र ने मार्ग दिया
• सेतु का निर्माण हुआ
• रावण सहित समस्त अधर्म का नाश हुआ
• धर्म की प्रतिष्ठा हुई
लंका पर विजय केवल शस्त्र से नहीं, व्रत, संयम और धर्म से प्राप्त हुई।
ऋषि का उपदेश
ऋषि बकदाल्भ्य ने कहा— “हे राम, जो भी मनुष्य इस व्रत को श्रद्धा से करेगा, वह अपने जीवन के हर संग्राम में विजयी होगा।”
कथा का फलश्रुति
जो व्यक्ति—विजया एकादशी की कथा सुनता या पढ़ता है , विधिपूर्वक व्रत करता है वह—
✔ शत्रु-बाधा से मुक्त होता है
✔ भय, मुकदमे, विरोध से उबरता है
✔ जीवन में धर्मयुक्त सफलता पाता है
✔ अंततः श्रीहरि-कृपा प्राप्त करता है
विजया एकादशी का गूढ़ संदेश - विजय तलवार से नहीं, व्रत और धर्म से होती है। जो विजय अहंकार से रहित हो, वही सच्ची विजय है।
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥