आमलकी एकादशी केवल उपवास नहीं है। यह वह तिथि है जब विष्णु स्वयं आमलकी वृक्ष में साक्षात् निवास करते हैं। जो इस दिन आमलकी का पूजन करता है, वह देह, मन और कर्म — तीनों स्तरों पर शुद्धि प्राप्त करता है।
आमलकी एकादशी – संपूर्ण पूजा-विधि
(आरोग्य, पापक्षय और विष्णु-सान्निध्य की एकादशी)
आमलकी एकादशी केवल उपवास नहीं है। यह वह तिथि है जब विष्णु स्वयं आमलकी वृक्ष में साक्षात् निवास करते हैं। जो इस दिन आमलकी का पूजन करता है, वह देह, मन और कर्म — तीनों स्तरों पर शुद्धि प्राप्त करता है।
1. प्रातः स्नान व शुद्धता — देह से आरंभ, आत्मा की ओर
• ब्रह्ममुहूर्त में जागें
• स्नान करें (गंगाजल मिश्रित जल श्रेष्ठ)
• पीले या स्वच्छ वस्त्र धारण करें
मन में यह भाव रखें— “आज मैं केवल शरीर नहीं, अपने संस्कारों को भी शुद्ध करने जा रहा/रही हूँ।”
2. संकल्प — जहाँ साधक अपने रोग और ऋण प्रभु को सौंपता है
पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर जल लें और कहें— “आज आमलकी एकादशी के पावन अवसर पर मैं श्रीहरि की प्रसन्नता, पापक्षय और आरोग्य हेतु यह व्रत करता/करती हूँ। हे विष्णु, मेरे कर्म-दोष, रोग और मोह को हर लें।”
यह संकल्प उस क्षण का प्रतीक है जब साधक अपने बोझ भगवान के चरणों में रख देता है।
3. वेदी की स्थापना — घर में वैकुण्ठ का अवतरण
एक स्वच्छ आसन पर रखें—
• श्रीविष्णु / श्रीकृष्ण की प्रतिमा
• तुलसी
• शंख
• दीपक
• गंगाजल
• चंदन
• पीले पुष्प
• आँवला (फल या शाखा सहित)
वेदी को ऐसे सजाएँ मानो भगवान स्वयं औषधि बनकर अवतरित होने वाले हों।
4. आमलकी की स्थापना — साक्षात् हरि का स्वरूप
तांबे या मिट्टी के पात्र में आँवला रखें और जल से शुद्ध करें। भाव रखें— “हे आमलकी, आप औषधि नहीं — अमृत हैं।”
5. दीप प्रज्वलन — रोग और अज्ञान के अंधकार का नाश
दीप जलाकर कहें— “हे प्रभु, जैसे यह दीप तमस को काटता है, वैसे ही मेरे भीतर की दुर्बलता और रोग कट जाएँ।” आमलकी एकादशी का दीप आरोग्य-दीप माना गया है।
6. आमलकी पूजन — शरीर और कर्म की शुद्धि
क्रमशः अर्पण करें—
1. जल
2. चंदन
3. अक्षत
4. पुष्प
5. धूप–दीप
मंत्र या भाव— “नमस्ते आमलके देवि विष्णु-वक्षःस्थले शुभे। सर्वपापहरा मातः आरोग्यं देहि मे सदा॥” यह पूजन
कर्मजन्य रोगों को शांत करता है।
7. श्रीविष्णु पूजन — जीवन में संतुलन का अवतरण
अब श्रीविष्णु का पूजन करें—
• तुलसी-दल अर्पण
• चंदन
• पुष्प
• नैवेद्य (फल/खीर)
जप करें— “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” (108 बार) यह जप मन और शरीर के बीच टूटे संतुलन को पुनः जोड़ता है।
8. कथा-स्मरण — पूजा का प्राण
आमलकी एकादशी की कथा (राजा चैत्ररथ और आमलकी वृक्ष की महिमा) श्रवण/पठन करें। कथा का स्मरण
पूजा को सिद्धि प्रदान करता है।
9. दान और सेवा — विष्णु का प्रिय कर्म
इस दिन विशेष फल मिलता है—
• आँवला दान
• अन्न दान
• औषधि या वस्त्र दान
10. रात्रि-जागरण — अमृत-काल
रात्रि में—
• हरिनाम
• विष्णु सहस्रनाम
• दीपक जलाकर ध्यान
यह जागरण दीर्घायु और तेज का कारण बनता है।
11. द्वादशी पारण — अमृत का ग्रहण
सूर्योदय के बाद—
• भगवान को भोग
• ब्राह्मण/गौ को अन्न
• फिर स्वयं आँवला ग्रहण कर पारण
प्रार्थना करें— “हे श्रीहरि, मेरे शरीर को नहीं, मेरे कर्मों को स्वस्थ कर दीजिए।”
आमलकी एकादशी का आध्यात्मिक रहस्य
• यह व्रत कर्म-रोगों को काटता है
• शरीर को तेजस्वी बनाता है
• विष्णु-सान्निध्य देता है
• मृत्यु-भय को शांत करता है
आमलकी एकादशी सिखाती है— आरोग्य भगवान की कृपा है, और कृतज्ञता उसका साधन।
आमलकी एकादशी – शास्त्रीय व्रत-कथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
(दस्यु-आक्रमण और देवी-रक्षा सहित)
फाल्गुन मास का शुक्ल पक्ष था। वसंत की कोमलता धरती पर उतर चुकी थी, पर उसी धरती पर अधर्म की छाया भी चुपचाप सरक रही थी। यह कथा है वैदिश नगर की।
धर्मनिष्ठ राजा और विष्णुभक्त प्रजा
वैदिश नगर का राजा धर्म, सत्य और विष्णु-भक्ति में स्थित था। नगर की प्रजा भी एकादशी-व्रत, दान और हरिनाम में लीन रहती थी। विशेषतः आमलकी एकादशी के दिन नगर के बाहर स्थित एक प्राचीन आमलकी वृक्ष के नीचे
सामूहिक पूजन होता था। शास्त्र कहते हैं— “तत्र आमलकी मूले विष्णुः साक्षात् विराजते।”
दस्युओं का षड्यंत्र
उसी समय निकटवर्ती वन प्रदेश में दस्युओं का एक दल निवास करता था। उन्होंने सुना— “उस दिन नगर के लोग रत्न, स्वर्ण, अन्न और वस्त्र लेकर वन में जाते हैं। न शस्त्र साथ रखते हैं, न रक्षा का विचार।” दस्यु-नायक ने कहा— “यह धर्म नहीं, हमारी विजय का अवसर है।”
आमलकी एकादशी का पावन दिन
एकादशी का दिन आया। प्रजा उपवास में थी। स्त्री, वृद्ध, बालक — सब आमलकी वृक्ष के नीचे विष्णु पूजन में लीन थे।
• शंख-नाद
• हरिनाम
• तुलसी और दीप
पूरा वन मानो वैकुण्ठ बन गया था।
अचानक दस्यु-आक्रमण
उसी क्षण चारों ओर से दस्युओं ने आक्रमण कर दिया। हाथों में शस्त्र, मुख पर क्रूरता, और हृदय में लोभ। प्रजा भयभीत हो गई। कोई भागा नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं कर सका। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण बोला— “डरो मत।
आज आमलकी एकादशी है। आज रक्षा स्वयं शक्ति करेंगी।”
देवी का साक्षात् प्राकट्य
अचानक आमलकी वृक्ष काँप उठा। उसके मूल से भयंकर तेज प्रकट हुआ। उस तेज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं — भुजाओं में शस्त्र, नेत्रों में अग्नि, और चरणों में करुणा। शास्त्र उन्हें आमलकी देवी / विष्णु-शक्ति कहते हैं।
दस्युओं का नाश
देवी ने गर्जना की— “जो धर्म के रक्षक हैं, उन्हें भय नहीं। जो अधर्म से आए हैं, उनका यहाँ स्थान नहीं।” क्षणमात्र में दस्यु मूर्छित हो गए। कुछ वहीं गिर पड़े, कुछ भय से भाग खड़े हुए। वन पुनः शांत हो गया।
देवी का उपदेश
देवी ने प्रजा से कहा— “यह वृक्ष केवल औषधि नहीं। यह विष्णु का निवास है। जो आमलकी एकादशी का व्रत करता है, उसकी रक्षा स्वयं शक्ति करती है।” इतना कहकर देवी आमलकी वृक्ष में लीन हो गईं।
भगवान विष्णु का वचन
तभी आकाश से भगवान विष्णु की वाणी गूँजी— “जो आमलकी एकादशी का व्रत करेगा, उसे शस्त्र, शत्रु, रोग और भय स्पर्श भी नहीं करेंगे।”
शास्त्रीय फलश्रुति
पद्मपुराण कहता है—
• पाप नाश
• अकाल मृत्यु से रक्षा
• रोग और भय से मुक्ति
• विष्णु-लोक की प्राप्ति
आमलकी एकादशी का गूढ़ संदेश
यह कथा सिखाती है—
🔹 जहाँ भक्ति है, वहाँ शक्ति स्वतः प्रकट होती है
🔹 एकादशी केवल उपवास नहीं — रक्षा-कवच है
🔹 जब मनुष्य निर्बल होता है, तब धर्म स्वयं शस्त्र बन जाता है
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥