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पापमोचनी एकादशी

पापमोचनी एकादशी वह तिथि है जब श्रीहरि केवल पापों को क्षमा नहीं करते, बल्कि उनके बीज तक को नष्ट कर देते हैं। यह एकादशी कर्म-बंधन काटने की तिथि है।

पापमोचनी एकादशी – संपूर्ण पूजा-विधि
(पाप-क्षय, संस्कार-शुद्धि और आत्मिक मुक्ति की एकादशी)
पापमोचनी एकादशी वह तिथि है जब श्रीहरि केवल पापों को क्षमा नहीं करते, बल्कि उनके बीज तक को नष्ट कर देते हैं। यह एकादशी कर्म-बंधन काटने की तिथि है।
1. प्रातः स्नान व शुद्धि — पाप से दूरी का प्रथम संकल्प
• ब्रह्ममुहूर्त में जागें
• स्नान करें (गंगाजल मिश्रित जल श्रेष्ठ)
• स्वच्छ, हल्के रंग के वस्त्र धारण करें
मन में भाव रखें— “आज मैं अपने जाने-अनजाने पापों से मुक्त होने जा रहा/रही हूँ।” यह स्नान
केवल शरीर का नहीं, पिछले जन्मों के संस्कारों का भी है।
2. संकल्प — जब आत्मा अपराध-बोध छोड़ती है
पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर हथेली में जल, अक्षत लें और कहें— “ॐ तत्सत् , चैत्र मासे कृष्ण पक्षे पापमोचनी एकादशी तिथौ मम सर्वपापक्षयार्थं श्रीविष्णु प्रीत्यर्थं एतद् व्रतं करिष्ये।” यह वह क्षण है जब आत्मा स्वीकार करती है— “मैं त्रुटिपूर्ण हूँ, पर शरणागत भी हूँ।”
3. वेदी की स्थापना — क्षमा का आसन
स्वच्छ आसन पर रखें—
• श्रीविष्णु / श्रीकृष्ण की मूर्ति
• तुलसी
• शंख
• दीपक
• गंगाजल
• चंदन
• पीले पुष्प
• फल या सात्त्विक नैवेद्य
वेदी को ऐसे सजाएँ मानो भगवान दंड नहीं, करुणा देने आए हों।
4. दीप प्रज्वलन — पाप-तम का क्षय
दीप जलाते समय कहें— “हे प्रभु, जैसे यह दीप अंधकार मिटाता है, वैसे ही मेरे भीतर का अपराध-भाव और पाप-संस्कार मिट जाए।” पापमोचनी एकादशी का दीप अंतरात्मा को हल्का करने वाला दीप माना गया है।

5. आचमन व आत्म-शुद्धि
गंगाजल से आचमन करें। भाव रखें— “मेरी वाणी, विचार और कर्म आज से विष्णु-मार्ग में स्थित हों।”
6. श्रीविष्णु का आवाहन — क्षमा के स्वामी का स्मरण
‘ॐ नमो नारायणाय’ का जप करते हुए भगवान का ध्यान करें। फिर कहें— “हे श्रीहरि, आप पतित-पावन हैं। आज आपकी शरण में अपने सभी दोष अर्पित करता/करती हूँ।”
7. विष्णु पूजन — करुणा का अवतरण
क्रमशः अर्पण करें—
1. गंगाजल
2. चंदन
3. अक्षत
4. पुष्प
5. तुलसी-दल
6. धूप-दीप
7. नैवेद्य
पूजा करते समय भाव रखें— “मैं अपने पाप नहीं छुपा रहा, मैं उन्हें अर्पित कर रहा हूँ।”
8. कथा-स्मरण — पूजा की आत्मा
पापमोचनी एकादशी की कथा (मेधावी ऋषि, मंजुघोषा अप्सरा और पाप-मोचन) का श्रवण/पठन करें। शास्त्र कहते हैं— कथा के बिना यह व्रत पूर्ण नहीं होता।
9. जप-पाठ — संस्कारों का क्षालन
इस दिन विशेष फलदायी— • विष्णु सहस्रनाम • या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ (108 बार) यह जप
अवचेतन में छिपे पाप-बीजों को जलाता है।
10. मौन व संयम — आंतरिक तप
• अनावश्यक वाणी से बचें
• क्रोध, निंदा और अहंकार से दूरी
• ब्रह्मचर्य का पालन (यथाशक्ति)
यह संयम व्रत का अदृश्य अंग है।
11. रात्रि जागरण — आत्मा का प्रायश्चित
रात्रि में—
• हरिनाम
• विष्णु कथा
• दीप के सामने मौन ध्यान
यह जागरण पश्चाताप को प्रज्ञा में बदल देता है।
12. द्वादशी पारण — शुद्ध जीवन का प्रवेश
द्वादशी को—
• सूर्योदय के बाद पारण
• पहले भगवान को भोग
• फिर सात्त्विक भोजन
प्रार्थना— “हे श्रीहरि, मेरे पाप नहीं, मेरी सीख मेरे साथ रहे।”
पापमोचनी एकादशी का आध्यात्मिक रहस्य
• यह व्रत कर्म-बंधन काटता है
• गुप्त पापों का भी नाश करता है
• मन से अपराध-बोध हटाता है
• आत्मा को हल्का और स्थिर बनाता है
पापमोचनी एकादशी सिखाती है— ईश्वर दंड देने से पहले क्षमा का द्वार खोलते हैं।

# पापमोचनी एकादशी कथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।

(पाप के बीज तक को नष्ट करने वाली कथा)
वसंत ऋतु और तप का उत्कर्ष
चैत्र मास का समय था। वनों में वसंत उतर चुका था। कोकिल की कूक, आम्र-मंजरियों की सुगंध और मंद समीर -
सब कुछ मन को मोहित करने वाला था। पर इसी सौंदर्य के मध्य एक तपस्वी ऐसा भी था जिसका मन इन सब से परे केवल ब्रह्म में स्थित था। यह थे महर्षि मेधावी।
महर्षि मेधावी का तपोवन
महर्षि मेधावी युवावस्था में ही संन्यास धारण कर चुके थे। उन्होंने इन्द्रियों को जीत लिया था, वाणी को मौन में बाँध दिया था, और मन को केवल नारायण में स्थिर कर दिया था। वन में उनका तप इतना प्रखर था कि— देवताओं के लोक में भी उसकी ऊष्मा अनुभव की जाने लगी।
इन्द्र का भय — तप से डगमगाता सिंहासन
देवराज इन्द्र जब भी किसी ऋषि का तप बढ़ता देखते हैं, तो उन्हें केवल एक भय सताता है— “कहीं यह तप
मेरे पद को न छीन ले।” इन्द्र ने देखा— महर्षि मेधावी का तप अब पूर्णता की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने सभा में कहा— “यदि यह तप पूर्ण हो गया, तो स्वर्ग का संतुलन बिगड़ जाएगा।”
अप्सरा मंजुघोषा का चयन
इन्द्र ने अप्सराओं में श्रेष्ठ मंजुघोषा को बुलाया। उससे कहा— “ऋषि का तप भंग करो। यही तुम्हारा कार्य है।” मंजुघोषा का हृदय काँप उठा। वह बोली— “हे देवराज, तपस्वी का पतन पाप है।” इन्द्र ने कठोर स्वर में कहा—
“यह देवकार्य है।”
तपोवन में सौंदर्य का प्रवेश
मंजुघोषा नूपुरों की मधुर ध्वनि, वीणा के स्वर और अलौकिक सौंदर्य के साथ महर्षि के आश्रम पहुँची। वसंत की रात थी। चंद्रमा पूर्णिमा-सा उज्ज्वल। मंजुघोषा ने—
• नृत्य किया
• मधुर गीत गाए
• और सौंदर्य से वातावरण भर दिया
तप का पतन — क्षण की दुर्बलता
महर्षि मेधावी नेत्र बंद किए बैठे थे। पर— इन्द्रियों का शत्रु बाहर नहीं, भीतर होता है। क्षण भर के लिए
मन डगमगाया। और वही क्षण वर्षों के तप पर भारी पड़ गया। ऋषि का तप भंग हो गया।
बोध और प्रचंड पश्चाताप
कुछ समय पश्चात् जब मोह का आवरण हटा, तो महर्षि पर सत्य बिजली की तरह गिरा। उनका हृदय पश्चाताप से जल उठा। क्रोध में उन्होंने कहा— “तू पिशाचिनी बन!” शाप पड़ते ही मंजुघोषा भूमि पर गिर पड़ी।
अप्सरा का विलाप
मंजुघोषा रोती हुई बोली— “हे ब्रह्मर्षि, मैं केवल साधन थी। अज्ञानवश अपराध हुआ। कृपा कर कोई मार्ग बताइए।” उसके आँसू धरती पर गिरते ही मानो धर्म स्वयं द्रवित हो गया।
पापमोचनी एकादशी का रहस्य
महर्षि का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कहा— “चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचनी कहलाती है।
इस दिन श्रीहरि का व्रत करने से घोर से घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं।” उन्होंने आगे कहा— “यह व्रत
केवल तुम्हें नहीं, मुझे भी शुद्ध करेगा।”
व्रत और तपस्या
मंजुघोषा ने—
• उपवास किया
• विष्णु पूजन किया
• कथा श्रवण किया
• रात्रि जागरण किया
और अपना पूरा पश्चाताप भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।

शाप से मुक्ति
व्रत पूर्ण होते ही आकाश से दिव्य प्रकाश उतरा। मंजुघोषा का पिशाच-स्वरूप नष्ट हो गया। वह पुनः
अप्सरा रूप में प्रकट हुई।
भगवान विष्णु का प्राकट्य
तभी श्रीहरि प्रकट हुए और बोले— “जो पापमोचनी एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप केवल क्षमा नहीं होते, उनका मूल भी नष्ट हो जाता है।” महर्षि मेधावी ने भी इस व्रत से तप-भंग का दोष धो डाला।
शास्त्रीय फलश्रुति
पद्मपुराण कहता है—
• ब्रह्महत्या समान पाप नष्ट
• गुप्त पापों का क्षय
• पश्चाताप की पूर्णता
• विष्णु लोक की प्राप्ति
“पापमोचनी व्रतं कृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।”
कथा का गूढ़ आध्यात्मिक संदेश
🔹 पतन अंतिम नहीं होता
🔹 पश्चाताप ईश्वर को प्रिय है
🔹 पाप स्वीकार करने से पहले क्षमा का द्वार खुलता है
पापमोचनी एकादशी सिखाती है— ईश्वर पहले सुधारते हैं, फिर उद्धार करते हैं।
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥