🕉️
🌸
🔱
🪔

वरूथिनी एकादशी

वरूथिनी एकादशी का परिचय
• मास : वैशाख
• पक्ष : कृष्ण पक्ष
• देवता : भगवान श्रीहरि विष्णु (वामन / त्रिविक्रम स्वरूप)
• अर्थ : “वरूथ” = कवच / रक्षा
यह एकादशी जीव को पाप, दरिद्रता, शाप और पतन से रक्षा करती है।

वरूथिनी एकादशी – पूजन विधि
(पद्मपुराण, स्कंदपुराण एवं वैष्णव आचार परंपरा पर आधारित)
वरूथिनी एकादशी का परिचय
• मास : वैशाख
• पक्ष : कृष्ण पक्ष
• देवता : भगवान श्रीहरि विष्णु (वामन / त्रिविक्रम स्वरूप)
• अर्थ : “वरूथ” = कवच / रक्षा
यह एकादशी जीव को पाप, दरिद्रता, शाप और पतन से रक्षा करती है।
वरूथिनी एकादशी – पूजन विधि
1. प्रातःकाल तैयारी
• ब्रह्म मुहूर्त में उठें
• स्नान करें (यदि संभव हो तो गंगाजल मिलाएँ)
• स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें
• पूजा स्थल को शुद्ध करें
2. कलश एवं विष्णु स्थापना
• चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ
• भगवान विष्णु / वामन / त्रिविक्रम की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
• दाहिने ओर तुलसी दल रखें
3. पंचोपचार / षोडशोपचार पूजा
क्रम इस प्रकार रखें—
1. आचमन
2. आसन समर्पण
3. पाद्य – अर्घ्य – आचमन
4. चंदन / कुंकुम / अक्षत
5. पुष्प अर्पण
6. धूप – दीप
7. नैवेद्य
o फल
o मिष्ठान्न
o पंचामृत (यदि संभव हो) तुलसी दल अति अनिवार्य है।
4. मंत्र जप
कम से कम 108 बार— ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या ॐ नमो नारायणाय
5. वरूथिनी एकादशी कथा
• स्वयं पढ़ें या सुनें
• कथा के बिना व्रत अपूर्ण माना गया है
6. रात्रि जागरण
• विष्णु सहस्रनाम
• हरि नाम संकीर्तन
• श्रीमद्भागवत पाठ
व्रत के नियम
✔ निर्जल व्रत श्रेष्ठ
✔ फलाहार / जलाहार भी मान्य
❌ अन्न, दाल, चावल, नमक वर्जित
❌ क्रोध, निंदा, मैथुन वर्जित
द्वादशी पारण विधि
• सूर्योदय के बाद
• ब्राह्मण / गाय / निर्धन को दान
• तुलसी युक्त भोजन से पारण
दान वस्तुएँ:
• अन्न
• वस्त्र
• तिल
• जलपात्र
वरूथिनी एकादशी का फल
पद्मपुराण अनुसार— “वरूथिनी पापहन्त्री सर्वसौभाग्यदायिनी।”
✔ दरिद्रता नाश
✔ शत्रु व बाधा से रक्षा
✔ स्त्री-अपमान, शाप दोष से मुक्ति
✔ विष्णु लोक की प्राप्ति
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
वरूथिनी = आत्मा का कवच , यह व्रत बताता है— जब आत्मा विष्णु में शरण लेती है, तो पाप स्वयं दूर हो जाते हैं।
# वरूथिनी एकादशी – व्रत कथा (शास्त्रीय, विस्तृत व भावात्मक रूप में)

॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।

वरूथिनी एकादशी का पृष्ठभूमि-संदेश
वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की यह एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं, यह पापों से रक्षा करने वाला कवच (वरूथ) है। जो जीव इस दिन श्रीहरि की शरण में जाता है, उसके चारों ओर अदृश्य रूप से दैवी सुरक्षा-चक्र बन जाता है।
कथा का आरंभ – धर्मराज युधिष्ठिर का प्रश्न
एक समय इंद्रप्रस्थ में, राजसभा में बैठे धर्मराज युधिष्ठिर के मन में एक गूढ़ प्रश्न उत्पन्न हुआ। उन्होंने श्रद्धा से श्रीकृष्ण की ओर देखा और कहा— “हे केशव! वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है? कौन-सा व्रत ऐसा है जो पाप, अपमान, पतन और दरिद्रता से रक्षा करता हो?” श्रीकृष्ण मंद मुस्कान के साथ बोले— “राजन्! तुमने अत्यंत गुप्त प्रश्न किया है। यह एकादशी वरूथिनी कहलाती है— जो जीव के चारों ओर धर्म का कवच बन जाती है।”
राजा मान्धाता की कथा
प्राचीन काल में मान्धाता नामक एक धर्मात्मा राजा हुए। वे सत्यवादी, दानी और विष्णु-भक्त थे, परंतु पूर्वजन्म के किसी अज्ञात कर्म के कारण उनके जीवन में अचानक घोर पतन आ गया।
राजा का पतन
एक दिन वन-विहार के समय— एक हिंसक वन्य पशु ने राजा पर आक्रमण कर दिया , राजा के पैर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गए , वे चलने में असमर्थ हो गए , राज्य, वैभव और सम्मान— सब होते हुए भी राजा असहाय हो गए।
वन में तपस्वी जीवन
राजा ने राज्य त्याग दिया और वन में रहने लगे। भूख, पीड़ा और अपमान— तीनों उनका भाग्य बन गए। एक दिन पीड़ा से व्याकुल होकर राजा विलाप करने लगे— “मैंने न कोई अधर्म किया, फिर यह दारुण दशा क्यों?”
उसी समय वहाँ ऋषि वशिष्ठ प्रकट हुए।
ऋषि वशिष्ठ का उपदेश
ऋषि ने करुणा से राजा की ओर देखा और कहा— “राजन्, यह तुम्हारे पूर्वजन्म के कर्मों का फल है। परंतु ईश्वर ने हर पतन के साथ उद्धार का मार्ग भी रखा है।” राजा ने दंडवत प्रणाम कर पूछा— “भगवन्! वह मार्ग बताइए, जिससे मेरा उद्धार हो सके।”
वरूथिनी एकादशी का विधान
ऋषि वशिष्ठ बोले— “वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी— वरूथिनी एकादशी का व्रत करो। इस दिन— निर्जल उपवास, भगवान विष्णु का पूजन , रात्रि जागरण , और व्रत का पुण्य श्रीहरि को समर्पित करो , यह व्रत तुम्हें पापों से ही नहीं, जीवन के अपमान और पतन से भी बचाएगा।”
व्रत का चमत्कार
राजा मान्धाता ने— पूर्ण श्रद्धा से व्रत किया , विष्णु नाम का जप किया , मन, वाणी और कर्म से स्वयं को शुद्ध किया जैसे ही द्वादशी आई— एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ , राजा का शरीर स्वस्थ होने लगा , उनके घाव भर गए , तेज और ओज पुनः लौट आया
श्रीहरि का दर्शन
आकाश से दिव्य वाणी हुई— “राजन्, यह वरूथिनी एकादशी का प्रभाव है। जो भी जीव इस व्रत को करता है, मैं स्वयं उसका रक्षक बन जाता हूँ।” राजा मान्धाता पुनः राज्य लौटे— इस बार पहले से अधिक धर्मपरायण बनकर।
श्रीकृष्ण का उपसंहार
श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से बोले— “राजन्, वरूथिनी एकादशी—
🔹 स्त्रियों के अपमान का नाश करती है
🔹 शाप और पतन से रक्षा करती है
🔹 दरिद्रता और रोग को हरती है
🔹 और अंततः विष्णुलोक प्रदान करती है।”
आध्यात्मिक रहस्य (गूढ़ अर्थ)
वरूथिनी का वास्तविक अर्थ है— जब आत्मा स्वयं को ईश्वर को सौंप देती है, तब ईश्वर स्वयं उसका कवच बन जाता है। यह व्रत सिखाता है—
• दोष सदा स्थायी नहीं होते
• शरणागति सबसे बड़ा उपाय है
• और करुणा का मार्ग ही मुक्ति का द्वार है


कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥