मोहिनी एकादशी का परिचय
• मास : वैशाख
• पक्ष : शुक्ल पक्ष
• देवता : भगवान श्रीविष्णु – मोहिनी अवतार
• तत्त्व : माया-बंधन से मुक्ति
यह एकादशी मोह, भ्रम, आसक्ति, मानसिक ग्रंथियों और कर्म-बंधन को काटने वाली मानी गई है।
मोहिनी एकादशी – संपूर्ण पूजा-विधि
(पद्मपुराण, स्कंदपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित परंपरा के अनुसार)
मोहिनी एकादशी का परिचय
• मास : वैशाख
• पक्ष : शुक्ल पक्ष
• देवता : भगवान श्रीविष्णु – मोहिनी अवतार
• तत्त्व : माया-बंधन से मुक्ति
यह एकादशी मोह, भ्रम, आसक्ति, मानसिक ग्रंथियों और कर्म-बंधन को काटने वाली मानी गई है।
1. प्रातः शुद्धि
• ब्रह्ममुहूर्त में जागें
• स्नान (गंगाजल मिश्रित जल)
• श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें
• पूजा स्थल की शुद्धि करें
2. वेदी एवं भगवान की स्थापना
• चौकी पर पीला वस्त्र
• श्रीविष्णु / मोहिनी स्वरूप का चित्र
• तुलसी दल अनिवार्य
• शंख, चक्र प्रतीक
3. आचमन एवं प्राणायाम
तीन बार आचमन करें क्षणभर आँख बंद कर मन को स्थिर करें “मेरा मन, मेरी बुद्धि आज श्रीहरि को समर्पित है।”
4. पंचोपचार / षोडशोपचार पूजन
क्रम—
1. जल अर्पण
2. चंदन, अक्षत
3. पुष्प
4. धूप
5. दीप
6. नैवेद्य (फल, मिष्ठान्न, पायस)
तुलसी-दल अर्पण करते समय विशेष भाव रखें— “हे विष्णु, मेरे मोह को काटें।”
5. विशेष मंत्र जप
108 बार— ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या ॐ नमो नारायणाय - मोहिनी एकादशी में यह जप मन की गांठों को खोलता है।
6. मोहिनी एकादशी कथा
पूजन के पश्चात् कथा का श्रवण/पठन अनिवार्य है। कथा के बिना इस व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।
7. रात्रि जागरण
• हरि नाम संकीर्तन
• विष्णु सहस्रनाम
• गीता अध्याय 12 (भक्ति योग)
यह जागरण माया-निद्रा को तोड़ने का प्रतीक है।
व्रत नियम
✔ निर्जल व्रत सर्वोत्तम
✔ फलाहार स्वीकार्य
❌ अन्न, चावल, दाल, नमक वर्जित
❌ क्रोध, निंदा, लोभ, काम वर्जित
द्वादशी पारण
• सूर्योदय के बाद
• तुलसी-युक्त भोजन
• ब्राह्मण / निर्धन को दान
दान—
• जल
• वस्त्र
• अन्न
• फल
मोहिनी एकादशी का फल
पद्मपुराण अनुसार—
✔ जन्म-जन्मांतर के मोह नष्ट
✔ बुद्धि शुद्ध होती है
✔ भक्ति मार्ग में स्थिरता
✔ कर्मबंधन से मुक्ति
✔ अंततः विष्णुलोक प्राप्ति
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
मोहिनी वह शक्ति है— जो माया को स्वयं माया से काटती है। इस दिन व्रत करने वाला माया के भीतर रहकर माया से मुक्त होना सीखता है।
# मोहिनी एकादशी – व्रत कथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
भद्रावती नगरी
प्राचीन समय में भद्रावती नगरी थी, जो सरस्वती नदी के किनारे स्थित थी। वहाँ एक महान और धर्मात्मा वैश्य रहता था — धनपाल। वह दानी, दयालु और विष्णु भक्त था। उसने अनेक कुएँ और प्याऊ बनवाए , गरीबों को आहार दिया , ब्राह्मणों का स्वागत किया ताकि नगर में धर्म, संतोष और पुण्य का वातावरण बना रहे। धनपाल के पाँच पुत्र थे। परंतु सबसे बड़ा पुत्र — धृष्टबुद्धि , बिलकुल विपरीत स्वभाव का था — पापी , निंदक , अधर्मप्रिय , और भोग वासना में लिप्त। धृष्टबुद्धि के पाप इतने बढ़े कि वह परिवार में किसी के साथ शील शिष्टाचार भी खो बैठा। बड़ों की बात न मानता, संतों की अवहेलना करता, और नगर में अनाचार फैलाने लगा — जिससे नगर में भय और अशांति फैल गई।
2. पाप का फल — निष्कासन
जब धृष्टबुद्धि के कृत्य इतने विकृत हो गए कि किसी ने भी उसे सहन नहीं किया, तब नगर के राजा और धनपाल ने सोचा कि धृष्टबुद्धि को सुधार के साधन नहीं बचा है। अंततः उसे नगर से निष्कासित कर दिया गया। धृष्टबुद्धि वनों में भटकने लगा और धीरे धीरे उसके पास धन भी समाप्त हो गया। भूख, प्यास, भय — तीनों उसका भाग्य बन गए। एक समय वह इतना विफल और अकेला हुआ कि उसने खुद को भी छोड़ दिया। वहीं कहीं दूर एक ऋषि का आश्रम था — महर्षि कौण्डिल्य। धृष्टबुद्धि वहाँ पहुँचा और विलाप करने लगा— “हे ऋषिवर! मैंने अपने जीवन में इतने पाप किये… अब मुझे किससे शरण मिलेगी? कौन सा उपाय बचा है?” ऋषि ने गम्भीरता से कहा— “हे पुत्र! संसार में पाप का शमन केवल विश्व भक्ति और एकादशी के व्रत द्वारा संभव है। वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी — इसे ‘मोहिनी एकादशी’ कहा जाता है। इसका व्रत करने से मोह, तन मन के बंधन और संचित पापों का क्षय होता है।”
3. व्रत का पालन
ऋषि के आदेश पर धृष्टबुद्धि ने मोहिनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया —
✔ निर्जल उपवास रखा
✔ श्रीहरि विष्णु का पूजन किया
✔ भूमिपूजन, दान, कथा श्रवण, नाम जप किया और पूर्ण श्रद्धा से प्रभु का स्मरण किया।
कल्पना मत कीजिए कि यह केवल खान पान का त्याग था — शास्त्रीय रूप से व्रत = मन, वाणी और कर्म की शुद्धि माना गया।
4. फल — पापों का नाश और उद्धार
एकादशी का व्रत पूर्ण करते ही धृष्टबुद्धि के समस्त पाप और भटकाव नष्ट हो गए। समाज, मन और मनुष्य तीनों स्तर पर उसके जीवन में परिवर्तन आया — उसने अपनी बुद्धि, वाणी और कर्म को सुधारा। इतना ही नहीं — शास्त्र कहते हैं कि ऐसे व्रत से मिलता है विष्णुलोक की प्राप्ति भी, जहाँ भय, मोह और पाप का कोई स्थान नहीं होता।
शास्त्रीय सार
🔹 “मोहिनी एकादशी” — वही तिथि है जब भगवान के रूप में माया को कटौती वाला उपाय प्रकाश में आता है।
🔹 इसका व्रत मोह, भ्रम, पाप और बन्धन को हरता है।
🔹 कथा श्रवण, नाम जप और पूरी श्रद्धा से इसका पालन करने से भक्त जीव का जीवन सुधरता है और आत्मा को कल्याण मिलता है।
गूढ़ दार्शनिक संकेत
📌 धृष्टबुद्धि — अहंकार और मोह का प्रतीक
📌 मोहिनी एकादशी व्रत — वही उपाय जो मोह को मोक्ष में बदलता है
📌 भक्ति, उपवास और कथा — आत्म बोध के प्रमुख अंग
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥