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निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी को—
• भीमसेनी एकादशी
• पाण्डव एकादशी
भी कहा जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को होता है और इसे सभी 24 एकादशियों का संयुक्त फल देने वाला व्रत माना गया है।

निर्जला एकादशी का परिचय
निर्जला एकादशी को—
• भीमसेनी एकादशी
• पाण्डव एकादशी
भी कहा जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को होता है और इसे सभी 24 एकादशियों का संयुक्त फल देने वाला व्रत माना गया है।
निर्जला एकादशी पूजा विधि
1. ब्रह्ममुहूर्त में उठना
• सूर्योदय से पूर्व जागें
• स्नान करें
• स्वच्छ वस्त्र धारण करें
• संकल्प लें—
“मम सकल पापक्षयपूर्वक श्रीहरि प्रीत्यर्थं निर्जला एकादशी व्रतं करिष्ये।”
2. संकल्प विधि
हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर—
• अपने नाम
• गोत्र
• तिथि
• स्थान
का स्मरण कर संकल्प करें। (यदि विधिवत संकल्प संभव न हो, तो मन से भी किया जा सकता है।)
3. श्रीविष्णु पूजन
पूजा स्थान पर—
• भगवान श्रीविष्णु / श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
• पास में तुलसी पत्र रखें
पूजन क्रम—
1. दीप प्रज्वलन
2. जल अर्पण
3. पुष्प अर्पण
4. तुलसी दल अर्पण (अत्यंत अनिवार्य)
5. धूप–दीप
6. नैवेद्य (फल, मिष्ठान — स्वयं नहीं ग्रहण करना)
4. मंत्र जप
निम्न में से कोई एक— “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, /“हरे कृष्ण हरे कृष्ण…”,/ विष्णु सहस्रनाम कम से कम 108 बार।
5. निर्जला व्रत नियम
इस दिन—
❌ जल ग्रहण नहीं
❌ अन्न नहीं
❌ फल नहीं
❌ दूध नहीं
✔ केवल भगवान का स्मरण
✔ मौन या संयम
✔ क्रोध, निंदा, अपशब्द वर्जित
यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे— तो मन से व्रत करके जल-त्याग कुछ समय तक भी मान्य माना गया है। (शास्त्र करुणा को धर्म का मूल मानते हैं।)
6. रात्रि जागरण
रात्रि में—
• हरिकथा
• विष्णु नाम
• भजन
• स्तोत्र पाठ
करना विशेष पुण्यदायी है।
7. द्वादशी पारण
अगले दिन—
• स्नान कर
• भगवान को जल अर्पित करें
• ब्राह्मण या गरीब को घड़ा, जल, पंखा, वस्त्र दान करें
• फिर स्वयं जल ग्रहण करें
पारण द्वादशी तिथि में ही करें।
निर्जला एकादशी दान विशेष
शास्त्रों में इस दिन—
• जल से संबंधित दान
• मटका, घड़ा
• सत्तू
• शीतल पेय
• पंखा
को महादान कहा गया है।
निर्जला एकादशी का फल :
पद्मपुराण में कहा गया—
• सभी 24 एकादशी व्रतों का फल
• जन्म–जन्मांतर के पाप नाश
• अकाल मृत्यु से रक्षा
• विष्णुलोक की प्राप्ति
भीमसेन जैसे महाबली को भी यही व्रत मोक्षमार्ग पर ले गया।
गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य
निर्जला व्रत का अर्थ केवल जल-त्याग नहीं—
यह है—
• इंद्रियों का संयम
• अहंकार का त्याग
• शरीर से ऊपर आत्मा की स्थापना
इसलिए इसे तपस्याओं में श्रेष्ठ तप कहा गया है।
# निर्जला एकादशी व्रत कथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।

एक समय की बात है — पाण्डव वनवास काल में महर्षि वेदव्यास के आश्रम में निवास कर रहे थे। युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी — सभी मास में दो बार एकादशी व्रत करते थे। केवल भीमसेन ऐसा नहीं कर पाते थे। भीम का शरीर विशाल था, अग्नि समान जठराग्नि थी। भूख सहन करना उनके लिए अत्यंत कठिन था।
भीमसेन का निवेदन
एक दिन भीमसेन ने अत्यंत विनयपूर्वक महर्षि वेदव्यास से कहा— “हे महामुने! मैं धर्म में स्थित रहना चाहता हूँ,
किंतु मास में दो बार उपवास करना मेरे लिए असंभव है। भूख से मेरी बुद्धि विचलित हो जाती है। क्या ऐसा कोई व्रत है जिसे करने से समस्त एकादशियों का फल प्राप्त हो जाए?” भीम की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास करुणा से मुस्कराए।
वेदव्यास जी का उपदेश
व्यासजी बोले— “हे भीम! तुम्हारी बात सत्य है। सब मनुष्य समान नहीं होते। जो मास में चौबीस एकादशी व्रत नहीं कर सकता, उसके लिए एक श्रेष्ठ व्रत है।” फिर उन्होंने कहा— “ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जो पुरुष या स्त्री निर्जल व्रत करता है — वह समस्त एकादशियों का फल प्राप्त करता है।”
निर्जला व्रत का विधान
व्यासजी बोले—
• इस दिन जल तक ग्रहण न किया जाए
• केवल भगवान श्रीहरि का स्मरण किया जाए
• रात्रि जागरण किया जाए
• द्वादशी को विधिपूर्वक पारण किया जाए
और जो ऐसा करता है— “उसके सभी पाप सूर्य के उदय होते ही हिम के समान नष्ट हो जाते हैं।”
व्रत का महात्म्य
व्यासजी ने कहा— “हे भीम! इस व्रत को करने वाले के पास मृत्यु के समय यमदूत नहीं आते।” बल्कि— “शंख, चक्र, गदा धारण किए विष्णुदूत आते हैं और उसे वैकुण्ठ लोक ले जाते हैं।” यह सुनकर भीमसेन के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी।
भीमसेन का व्रत
भीमसेन ने उसी क्षण संकल्प लिया— “हे गुरुदेव! मैं जीवन भर इस एक निर्जला एकादशी का
कठोर व्रत करूँगा।” तभी से यह एकादशी— भीमसेनी एकादशी /पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

फलश्रुति :
व्यासजी कहते हैं—
• सभी एकादशियों का पुण्य
• ब्रह्महत्या आदि महापापों का नाश
• अकाल मृत्यु से रक्षा
• विष्णुलोक की प्राप्ति
“निर्जला एकादशी व्रतं सर्वपापनाशनम्।”
आध्यात्मिक रहस्य
निर्जला एकादशी केवल—
❌ पानी न पीने का व्रत नहीं है
बल्कि—
✔ इंद्रियों का संयम
✔ अहंकार का क्षय
✔ शरीर से ऊपर आत्मा की स्थापना
इसलिए शास्त्र कहते हैं— “निर्जला एकादशी समस्त व्रतों की शिरोमणि है।”
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥