योगिनी एकादशी आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी है। यह व्रत रोग, दरिद्रता, पाप, और कर्मबंधन नाश करने वाला , विशेष रूप से रोगमुक्ति और आर्थिक शुद्धि देने वाला माना गया है।
योगिनी एकादशी कथा
योगिनी एकादशी — संपूर्ण पूजा-विधि
योगिनी एकादशी आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी है। यह व्रत रोग, दरिद्रता, पाप, और कर्मबंधन नाश करने वाला , विशेष रूप से रोगमुक्ति और आर्थिक शुद्धि देने वाला माना गया है।
प्रातः स्नान एवं शुद्धता
(शरीर से अधिक — कर्मों की शुद्धि)
• ब्रह्ममुहूर्त में उठें
• स्नान करें (गंगाजल मिश्रित जल श्रेष्ठ)
• काले, पीले या सादा वस्त्र धारण करें
• मौन भाव रखें
मन में यह भाव करें— “हे श्रीहरि, मेरे पूर्वकर्मों से उत्पन्न रोग, कष्ट और दरिद्रता आज इस व्रत से नष्ट हों।”
संकल्प विधि
पूर्व या उत्तर दिशा में बैठें। दाएँ हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लें। भावात्मक संकल्प—
“अहं अमुक नाम, आषाढ़ कृष्ण पक्षे योगिनी एकादश्यां श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं योगिनी एकादशी व्रतं करिष्ये।” संकल्प के बाद जल भूमि पर छोड़ दें।
वेदी की स्थापना
(घर में वैकुण्ठ भाव) वेदी पर रखें—
• श्रीविष्णु / श्रीकृष्ण का चित्र
• तुलसी दल
• पीला वस्त्र
• शंख
• दीपक
• धूप
• चंदन
• पुष्प
• फल (आम, केला, नारियल श्रेष्ठ)
दीप प्रज्वलन — रोग व पाप नाश का प्रतीक
घी का दीप जलाते हुए कहें— “हे नारायण, जैसे यह दीप अंधकार हरता है, वैसे ही मेरे जीवन के रोग, ऋण और पाप हर लो।”
आवाहन व ध्यान
आँख बंद कर 11 या 21 बार जप करें— ॐ नमो भगवते वासुदेवाय फिर कहें— “हे योगेश्वर विष्णु,
आज योगिनी एकादशी के पावन व्रत में आप साक्षात् पधारें।”
श्रीविष्णु पूजन क्रम
क्रम इस प्रकार रखें—
1. गंगाजल अर्पण
2. चंदन–रोली–अक्षत
3. पुष्प अर्पण
4. तुलसी दल (अत्यंत अनिवार्य)
5. धूप
6. दीप
7. फल नैवेद्य
पूजन भाव— “मेरे कर्मों की गांठ खुल जाए, मेरे रोग मूल से नष्ट हों।”
विशेष मंत्र-जप (मुख्य भाग)
योगिनी एकादशी में यह मंत्र विशेष फल देता है— ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 या 1008 जप)
• रोग, दरिद्रता, मानसिक पीड़ा में अत्यंत प्रभावी
कथा-पाठ (अवश्य करें)
योगिनी एकादशी की कथा राजा कुबेर – माली हेममाली – रोग मुक्ति की कथा इस व्रत की आत्मा है। कथा बिना व्रत अपूर्ण माना गया है।
दान विधान
इस दिन दान अत्यंत शीघ्र फल देता है—
• अन्न दान
• वस्त्र दान
• फल दान
• औषधि दान (अत्यंत श्रेष्ठ)
दान करते समय कहें— “इस व्रत का पुण्य समस्त रोगग्रस्त जीवों को शांति दे।”
रात्रि भाव साधना (यदि संभव हो)
पूर्ण जागरण आवश्यक नहीं, परंतु— 1 घंटा विष्णु नाम जप या हरिवंश / विष्णु सहस्रनाम (यह व्रत को कई गुना फल देता है।)
द्वादशी पारण विधि
अगले दिन— सूर्योदय के बाद तुलसी अर्पण कर सात्त्विक भोजन लें
पारण मंत्र भाव— “हे श्रीहरि, यदि इस व्रत में कोई त्रुटि हुई हो तो कृपया क्षमा करें।”
योगिनी एकादशी का आध्यात्मिक रहस्य
• यह व्रत पूर्व जन्म के रोगकारी कर्म काटता है
• चर्म, रक्त, स्नायु, मानसिक रोग में विशेष फलदायी
• धन हानि, नौकरी रुकावट, व्यापार अवरोध हटाता है
• दरिद्रता-नाशक एकादशी मानी गई है
निष्कर्ष
योगिनी एकादशी केवल उपवास नहीं— यह कर्म-शुद्धि चिकित्सा है। जहाँ औषधि नहीं चलती, वहाँ यह व्रत कार्य करता है।
#श्रीयोगिनी एकादशी व्रतकथा
॥ एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।
एक समय की बात है — जब धर्मराज युधिष्ठिर, सभी पाण्डवों सहित महर्षि वेदव्यास जी के समीप उपस्थित हुए। हाथ जोड़कर, विनम्र स्वर में युधिष्ठिर बोले— “हे महर्षिवर! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उसका व्रत कैसे किया जाता है और उससे कौन-सा फल प्राप्त होता है?”
व्यास जी बोले — महर्षि वेदव्यास ने करुण दृष्टि से युधिष्ठिर की ओर देखा और बोले— “हे राजन्! आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी योगिनी एकादशी कहलाती है। यह व्रत पापों का नाश करने वाला, रोगों को हरने वाला और दरिद्रता को दूर करने वाला है।” “जो मनुष्य इस व्रत को श्रद्धा से करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के दोष नष्ट हो जाते हैं।”
योगिनी एकादशी की दिव्य कथा
व्यास जी बोले— बहुत प्राचीन समय की बात है। स्वर्गलोक में अलकापुरी नाम की एक दिव्य नगरी थी। उस नगरी के अधिपति थे — धन के देवता कुबेर। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। प्रतिदिन वे नंदनवन से दिव्य पुष्प मँगवाकर भगवान शंकर की पूजा किया करते थे। उन पुष्पों को लाने का कार्य हेममाली नामक गंधर्व को सौंपा गया था।
हेममाली का अपराध
एक दिन हेममाली पुष्प लाने गया। परंतु मार्ग में उसकी दृष्टि अप्सरा विशालाक्षी पर पड़ गई। रूप-मोह में पड़कर
वह पुष्प लाना भूल गया। समय बीतता गया… और उधर भगवान शिव की पूजा का समय निकल गया। कुबेर को जब यह ज्ञात हुआ कि पूजा के पुष्प नहीं आए, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने हेममाली को बुलवाया।
कुबेर का शाप
कुबेर ने कठोर वाणी में कहा— “हे दुष्ट! अपने कर्तव्य को भूलकर तू कामवासना में लिप्त हुआ। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूँ — तू कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर पृथ्वी लोक में निवास करेगा।” क्षण मात्र में हेममाली स्वर्ग से गिरकर
मृत्युलोक में आ पहुँचा। उसका दिव्य शरीर रोगों से ग्रस्त हो गया। कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर वह अत्यंत दुःखी रहने लगा।
ऋषि के दर्शन
बहुत समय तक दुःख भोगने के बाद एक दिन वह वन में भटकते-भटकते महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुँचा। हेममाली ने ऋषि के चरणों में गिरकर रोते हुए कहा— “हे महामुने! मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं। कृपा कर मुझे
इस भयानक रोग से मुक्ति का उपाय बताइए।”
ऋषि मार्कण्डेय का उपदेश
महर्षि मार्कण्डेय ने दया से कहा— “वत्स! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत कर।” “इस व्रत के प्रभाव से तेरे सारे पाप नष्ट होंगे, रोग दूर होगा और तू पुनः दिव्य रूप को प्राप्त करेगा।”
व्रत का फल
हेममाली ने पूर्ण श्रद्धा से योगिनी एकादशी का व्रत किया। उस दिन उसने—
• उपवास रखा
• भगवान विष्णु का पूजन किया
• कथा का श्रवण किया
• और रात को हरिनाम का स्मरण किया
व्रत पूर्ण होते ही उसका कुष्ठ रोग नष्ट हो गया। उसका दिव्य गंधर्व शरीर पुनः प्रकट हो गया। स्वर्ग से विमान आया
और वह कुबेर की पुरी अलकापुरी लौट गया।
व्यास जी बोले —
“हे युधिष्ठिर! यही है योगिनी एकादशी का प्रभाव।” “जो मनुष्य इस व्रत को करता है — उसे रोग नहीं सताते, दरिद्रता पास नहीं आती, और अंत में वह भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।”
फलश्रुति
जो व्यक्ति - योगिनी एकादशी की कथा पढ़ता है या श्रद्धा से सुनता है उसे—
• ब्रह्महत्या जैसे पापों से भी मुक्ति मिलती है
• समस्त रोग नष्ट होते हैं
• और विष्णुलोक की प्राप्ति होती है
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥