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पद्मा एकादशी

पद्मा एकादशी को देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है। इसी दिन से भगवान श्रीहरि योगनिद्रा (चातुर्मास) में प्रवेश करते हैं। यह एकादशी व्रत–भक्ति–संयम का महाद्वार मानी गई है।

पद्मा एकादशी कथा
पद्मा एकादशी — संपूर्ण पूजा-विधि
(आषाढ़ शुक्ल पक्ष )
पद्मा एकादशी को देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है। इसी दिन से भगवान श्रीहरि योगनिद्रा (चातुर्मास) में प्रवेश करते हैं। यह एकादशी व्रत–भक्ति–संयम का महाद्वार मानी गई है।
पद्मा (देवशयनी) एकादशी — संपूर्ण पूजा-विधि
1️⃣ प्रातः स्नान व शुद्धता
(चातुर्मास का प्रथम संस्कार)
• ब्रह्ममुहूर्त में जागें
• गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें
• पीले वस्त्र धारण करें
• मन में यह संकल्प रखें—
“आज से मैं चार मास श्रीहरि की शरण में संयम और भक्ति से रहूँगा/रहूँगी।” यह दिन केवल व्रत नहीं, जीवन-शुद्धि की शुरुआत है।

2️⃣ संकल्प विधि
पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। दाएँ हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लें। भावात्मक संकल्प— “अहं अमुक नाम, आषाढ़ शुक्ल पक्षे पद्मा (देवशयनी) एकादश्यां श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं व्रतं करिष्ये।” जल भूमि पर छोड़ दें।

3️⃣ वेदी स्थापना
(घर में वैकुण्ठ भाव) वेदी पर रखें—
• भगवान विष्णु या शयन मुद्रा में श्रीहरि
• शेषनाग शैय्या का चित्र (यदि उपलब्ध हो)
• पीला वस्त्र
• तुलसी
• शंख
• चक्र प्रतीक
• धूप–दीप
• पुष्प
• फल व खीर
4️⃣ दीप प्रज्वलन — धर्म दीप
घी का दीप जलाते हुए कहें— “हे अनंत नारायण, आप आज योगनिद्रा में प्रवेश कर रहे हैं, कृपा कर मेरे भीतर धर्म की ज्योति जाग्रत रखें।”
5️⃣ आवाहन व ध्यान
21 बार जप करें— ॐ नमो भगवते वासुदेवाय फिर प्रार्थना करें— “हे श्रीहरि, आज से चातुर्मास आरंभ है, मेरी इन्द्रियाँ संयम में रहें, मेरी बुद्धि धर्म में स्थित रहे।”
6️⃣ श्रीविष्णु पूजन क्रम
क्रम इस प्रकार रखें—
1. गंगाजल अर्पण
2. चंदन–रोली–अक्षत
3. पुष्प अर्पण
4. तुलसी-दल (अनिवार्य)
5. धूप
6. दीप
7. नैवेद्य (फल, खीर, पंचामृत)
पूजन भाव— “हे पद्मनाभ, मेरी चंचलता शयन में जाए, मेरी भक्ति जागृत रहे।”
7️⃣ विशेष संकल्प — चातुर्मास नियम
इस दिन एक संयम-संकल्प अवश्य लें— जैसे—
• तेल त्याग
• प्याज–लहसुन त्याग
• एक समय भोजन
• क्रोध–निंदा त्याग
• ब्रह्मचर्य पालन
यह संकल्प चातुर्मास का मूल है।
8️⃣ कथा-पाठ (अत्यंत आवश्यक)
पद्मा एकादशी की कथा राजा माण्डाता — पुत्र धर्मपाल — और विष्णु कृपा की कथा पढ़ना या सुनना अनिवार्य माना गया है। कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
9️⃣ दान विधान
इस दिन दान का विशेष महत्व—
• शय्या दान
• वस्त्र दान
• छाता, पंखा दान
• अन्न दान
दान करते समय कहें— “हे हरि, यह दान चातुर्मास की शुद्धि बने।”
🔟 रात्रि जागरण (श्रेष्ठ)
यदि संभव हो तो—
• विष्णु सहस्रनाम
• हरिनाम संकीर्तन
• भागवत श्रवण
यह शयन से पूर्व श्रीहरि को समर्पण माना जाता है।
1️⃣1️⃣ द्वादशी पारण
अगले दिन—
• तुलसी पूजन करें
• ब्राह्मण या गरीब को भोजन दें
• स्वयं सात्त्विक भोजन करें
भाव— “हे नारायण, मेरी त्रुटियों को क्षमा करें।”
पद्मा एकादशी का आध्यात्मिक रहस्य
• यह व्रत जीवन को संयम की दिशा देता है
• चातुर्मास की नींव यहीं पड़ती है
• भोग से योग की यात्रा यहीं से शुरू होती है
• श्रीहरि शयन में जाते हैं — पर भक्त की चेतना जागती है
निष्कर्ष
पद्मा एकादशी केवल एक दिन का व्रत नहीं— यह चार मास की आत्मिक साधना का प्रवेश द्वार है।
#श्रीपद्मा (देवशयनी) एकादशी कथा
॥ श्रीपद्मा (देवशयनी) एकादशी व्रतकथा पाठ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
श्रीवेदव्यासाय नमः।

एक समय धर्मराज युधिष्ठिर महर्षि वेदव्यास जी के समीप विनयपूर्वक उपस्थित हुए। हाथ जोड़कर युधिष्ठिर बोले— “हे भगवन्! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उसका माहात्म्य क्या है? तथा उससे कौन-सा फल प्राप्त होता है?”
व्यास जी बोले — महर्षि वेदव्यास बोले— “हे राजन्! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मा एकादशी कहलाती है। यही एकादशी देवशयनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।” “इसी दिन भगवान श्रीहरि क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं।” “इस एकादशी से चातुर्मास का आरंभ होता है और जो मनुष्य इसका व्रत करता है वह महान पुण्य का अधिकारी बनता है।”
पद्मा एकादशी की दिव्य कथा
व्यास जी बोले— प्राचीन काल की बात है। सूर्यवंश में माण्डाता नाम के एक प्रतापी राजा हुए। वे सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण और प्रजा-पालन में अत्यंत दक्ष थे। उनके राज्य में धर्म, दया और सत्य का विस्तार था। किन्तु एक समय
राज्य में भयंकर अनावृष्टि हुई।
राज्य पर संकट
वर्षा न होने से— खेत सूख गए , नदियाँ सूख गईं . प्रजा भूख से पीड़ित होने लगी ! राजा माण्डाता अत्यंत व्याकुल हो उठे। उन्होंने सोचा— “यदि राजा स्वयं तप न करे तो प्रजा का दुःख कैसे मिटे?”
वनगमन और तप
राजा माण्डाता राज्य त्यागकर वन को चले गए। वहाँ उन्होंने कठोर तप आरंभ किया। दिन-रात भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए उन्होंने भोजन तक त्याग दिया। कई वर्षों तक वे केवल हरिनाम में लीन रहे।
भगवान विष्णु का प्राकट्य
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान श्रीहरि तेजस्वी रूप में प्रकट हुए। भगवान बोले— “हे राजन्! तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो।” राजा माण्डाता ने हाथ जोड़कर कहा— “हे प्रभु! मेरी नहीं, मेरी प्रजा की रक्षा कीजिए। राज्य में वर्षा हो, और सभी प्राणी सुखी हों।”
विष्णु का वरदान
भगवान विष्णु बोले— “हे राजन्! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पद्मा एकादशी का व्रत करो।” “इस व्रत के प्रभाव से वर्षा होगी, अन्न उत्पन्न होगा और राज्य पुनः समृद्ध होगा।”
व्रत का प्रभाव
राजा माण्डाता ने विधिपूर्वक पद्मा एकादशी का व्रत किया। जैसे ही व्रत पूर्ण हुआ— आकाश में मेघ छा गए , मूसलाधार वर्षा हुई , खेत हरे हो गए , प्रजा आनंदित हो उठी , राज्य में फिर से धर्म और समृद्धि लौट आई।
व्यास जी बोले —
“हे युधिष्ठिर! पद्मा एकादशी का व्रत न केवल व्यक्तिगत पापों का नाश करता है, बल्कि पूरे कुल और राज्य का भी कल्याण करता है।” “जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह अंत में श्रीहरि के परमधाम को प्राप्त करता है।”
फलश्रुति
जो व्यक्ति— पद्मा एकादशी की कथा पढ़ता है , या श्रद्धा से सुनता है , उसके—
• समस्त पाप नष्ट होते हैं
• चातुर्मास के पुण्य की प्राप्ति होती है
• और जीवन में स्थिरता आती है
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
हरि: ॐ तत्सत्