एक समय की बात है — सत्य, धर्म और सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध राजा हरिश्चन्द्र सूर्यवंशी चक्रवर्ती के रूप में अपनी प्रजा का कल्याण करते थे। वे इतने सच्चे और सत्यवादी थे कि उनका वचन सबसे प्रिय और अपरिवर्तनीय माना जाता था। राजा का राज्य धन धान्य और वैभव से संपन्न था। परंतु समय की गति अपरिवर्तनीय थी — एक कठिन समय आया जब उनके लिए समाज और परिवार के साथ जीवन कठिन हो गया।
अजा एकादशी पूजा-विधि
1️⃣ स्नान और शुद्धता – पवित्रता का प्रथम चरण
• ब्रह्ममुहूर्त में उठें।
• गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान करें।
• साफ, हल्के रंग (सफेद या पीला) वस्त्र पहनें।
• मन में संकल्प करें:
“मैं आज अजा एकादशी का व्रत अपने और अपने पितरों के कल्याण हेतु कर रहा/रही हूँ।
2️⃣ संकल्प – व्रत की नींव
• पूर्व या उत्तर दिशा की ओर बैठें।
• हाथ में जल लेकर दीपक प्रज्वलित करें।
• उच्चारण या भाव:
“हे श्रीहरि, मैं आज अजा एकादशी का व्रत कर रहा/रही हूँ। इस व्रत का फल मेरे पितरों और मेरे घर के कल्याण के लिए हो।”
3️⃣ व्रत वेदी की स्थापना – वैकुण्ठ का अनुभव
• स्वच्छ आसन पर वेदी सजाएँ।
• सामग्री:
o श्रीहरि विष्णु / कृष्ण की मूर्ति या चित्र
o तुलसी पत्ते या तुलसी पौधा
o शंख और चक्र
o अक्षत, रोली, चंदन
o दीपक और धूप
o फल, खीर, गुड़ (नैवेद्य) , वेदी सजाएँ जैसे भगवान स्वयं पधारने वाले हों।
4️⃣ दीप-प्रज्वलन – अज्ञान के अंधकार का नाश
• दीप जलाकर दोनों हाथ जोड़ें।
• मन में उच्चारण करें:
“हे प्रभु, जैसे यह दीप अंधकार मिटाता है, वैसे ही मेरे पितरों और मेरे घर के कष्ट और पाप दूर हों।”
5️⃣ आचमन और शुद्धि मंत्र
• गंगाजल से आचमन करें।
• भाव:
“हे विष्णु, मेरे विचार, वाणी और कर्म आज आपकी शरण में हैं।”
6️⃣ भगवान विष्णु का आवाहन
• ‘ॐ नमो नारायणाय’ मंत्र का जाप करें।
• ध्यान में रखें: “हे प्रभु, आज आपका व्रत समर्पित है। मेरे पितरों और घर की रक्षा करें।”
7️⃣ विष्णु पूजन – हृदय में प्रकाश का अवतरण
1. गंगाजल अर्पण
2. अक्षत, चंदन, रोली अर्पण
3. तुलसी पत्ते और पुष्प अर्पण
4. पीले या सफेद पुष्प अर्पण
5. धूप-दीप प्रदक्षिणा
6. नैवेद्य (खीर, फल, गुड़) अर्पण
7. जल अर्पण (पितरों को समर्पित)
इस दौरान मन में भाव रखें कि व्रत का प्रत्येक पुण्य पितरों और घर की सुख-समृद्धि हेतु समर्पित है।
8️⃣ कथा-स्मरण
• अजा एकादशी कथा का श्रवण या पाठ करें।
9️⃣ मंत्र-जाप और रात्रि जागरण
• रात को कम से कम 1–2 घंटे जागरण करें।
• मंत्र: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
🔟 द्वादशी पारण – व्रत का समापन
• सूर्योदय के बाद पारण करें।
• सात्त्विक भोजन लें: खीर, चावल, मूंग, फल।
• प्रार्थना करें:
“हे श्रीहरि, इस व्रत का फल मेरे पितरों और घर को प्राप्त हो।सभी पितर प्रकाश को प्राप्त हों और घर में सुख-शांति बनी रहे।”
1️⃣1️⃣ व्रत का आध्यात्मिक सार
• यह व्रत पितृकल्याण और व्रत-दोष शुद्धि के लिए श्रेष्ठ है।
• विधिपूर्वक पालन करने से सभी पूर्वजन्म के दोष नष्ट होते हैं।
• पितरों के उद्धार और घर की समृद्धि के लिए अत्यन्त फलदायी है।
अजा एकादशी व्रत कथा
(भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी व्रत कथा)
🕉️ प्रारंभ मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
कथा प्रारंभ
एक समय की बात है — सत्य, धर्म और सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध राजा हरिश्चन्द्र सूर्यवंशी चक्रवर्ती के रूप में अपनी प्रजा का कल्याण करते थे। वे इतने सच्चे और सत्यवादी थे कि उनका वचन सबसे प्रिय और अपरिवर्तनीय माना जाता था। राजा का राज्य धन धान्य और वैभव से संपन्न था। परंतु समय की गति अपरिवर्तनीय थी — एक कठिन समय आया जब उनके लिए समाज और परिवार के साथ जीवन कठिन हो गया।
एक दिन राजा को ऋषि विश्वामित्र का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। स्वप्न में ऋषि विश्वामित्र ने उनसे कहा कि राज और वैभव संसारिक प्रकृति के चारों ओर ही सीमित हैं। उन्होंने राजा से कहा कि उनके सत्य और वचन की परीक्षा ली जाएगी। राजा ने अपनी सत्यनिष्ठा से कभी छेड़छाड़ नहीं की और अपने राजा पद, परिवार और वैभव को भी त्याग दिया। इतना ही नहीं — सत्य पालन और अपने वचन की पवित्रता के कारण वे अपने परिवार और राज्य को छोड़कर इतने बड़े दुःख में चले गए कि वे चाण्डाल की सेवा में भी काम करने लगे। यह एक शारीरिक और मानसिक परिश्रम का समय था जिसमें हरिश्चन्द्र ने अपने को खोया और सत्य की एकाग्रता को अपनाया।
ऋषि गौतम का उपदेश
एक बार कठिन परिस्थितियों में राजा हरिश्चन्द्र बैठे थे। तभी महर्षि गौतम उनके पास आए। उन्होंने राजा से पूछा कि इतने दुःख का कारण क्या है। राजा ने विनयपूर्वक अपनी कथा, दुःख और समस्या को विस्तृत रूप से बताया। महर्षि गौतम ने कहा — “हे राजन्! तुम्हारा यह दुःख, पाप और कठिन काल अभी समाप्त नहीं हुआ है, परन्तु भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी — अजा एकादशी का व्रत यदि तुम श्रद्धापूर्वक रखोगे, तो यह सब दुख तुमसे वियोग करेगा। वह व्रत दिनभर उपवास, भगवान विष्णु की पूजा, कथा पठन और रात्रि जागरण से पूर्ण होगा।” उन्होंने आगे कहा — “जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत विधिपूर्वक और सच्चे हृदय से करता है, उसे जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं, पाप नष्ट होते हैं, और वह वापस अपने खोए हुए वैभव, परिवार और आत्म शांति को प्राप्त कर सकता है।”
व्रत का पालन
राजा हरिश्चन्द्र ने गौतम ऋषि की आज्ञा से अजा एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा के साथ किया।
उन्होंने—
✔ दिनभर उपवास किया
✔ भगवान विष्णु का पूजन किया
✔ रात्रि में जागरण किया
✔ श्रीहरि का नाम लिए रखा
✔ कथा पाठ सुनी और मन में भक्ति भाव रखा
उनके विश्वास, भक्ति और नियम के कारण — अजा एकादशी का फल तुरंत मिलने लगा।
दिव्य परिणति
जब अजा एकादशी का व्रत पूर्ण हुआ और द्वादशी को पारण किया गया, सोचने योग्य, पवित्र और दिव्य घटना घटित हुई —
✨ आपकी मृत पुत्र की आत्मा पुनः जीवित हुई।
✨ उनकी पत्नी उन्हें पुनः प्राप्त हुई।
✨ उनका राज्य, वैभव, परिवार — सब पुनः लौटा।
✨ भगवान विष्णु की कृपा सदैव स्थिर हो गई।
यह क्षण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि इस व्रत के पालन से — जो खोया है, वह पुनः प्राप्त होता है। जो पीड़ा है, वह शांत होती है और सत्पुरुष की भक्ति का फल तुरंत मिलता है।
शास्त्रीय शिक्षा
❖ अजा एकादशी वह पवित्र तिथि है, जो भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आती है और इसका व्रत करने से सभी प्रकार के पाप, कष्ट और बाधाएँ दूर होती हैं।
❖ भगवान विष्णु की कृपा से भक्त अपनी मनोकामनाएँ, दुख, और बाधाएँ हटाकर जीवन में सुख, शांति और कल्याण प्राप्त करता है।
❖ इसी वैष्णव परंपरा में यह कथा सुनना व्रत का अनिवार्य अंग है — क्योंकि कथा के बिना व्रत का पूर्ण फल नहीं माना जाता।
समापन
इस कथा से ज्ञात होता है कि— जो श्रद्धापूर्वक और नियमपूर्वक अजा एकादशी का उपवास रखता है, भगवान विष्णु की कृपा से जीवन की सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं, और वह जीवन में सुख समृद्धि तथा धर्मशीलता की प्राप्ति करता है।
इति अजा एकादशी व्रत कथा सम्पूर्णा।