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परिवर्तिनी एकादशी

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— “हे प्रभो! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसका व्रत कैसे किया जाता है और उसका फल क्या होता है?” तब भगवान विष्णु ने कहा— “हे युधिष्ठिर! भाद्रपद शुक्ल एकादशी को परिवर्तिनी (Parivartini) Ekadashi भी कहा जाता है। यह वही एकादशी है जिस दिन मैं वामन अवतार के रूप में प्रकट हुआ था। जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इस दिन मैंने राजा बलि को वामन रूप से जीता और धर्म की स्थापना की।”

परिवर्तिनी एकादशी पूजा विधि
1️⃣ प्रातः स्नान और शुद्धता
• ब्रह्ममुहूर्त में उठें।
• गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान करें।
• सफेद या हल्के पीले वस्त्र पहनें।
• मन में संकल्प करें:
“आज मैं परिवर्तिनी एकादशी का व्रत अपने और मेरे पितरों के कल्याण, घर की समृद्धि और धर्म की स्थापना हेतु कर रहा/रही हूँ। हे भगवान विष्णु, इस व्रत से मेरे पितरों का उद्धार और घर में सुख शांति बनी रहे।”
2️⃣ संकल्प — व्रत का आरंभ
• पूर्व या उत्तर दिशा की ओर बैठें।
• हाथ में जल लेकर दीपक प्रज्वलित करें।
• उच्चारण या भाव:
“हे प्रभु, मैं आज परिवर्तिनी एकादशी का व्रत संकल्पपूर्वक करता/करती हूँ। इसके पुण्य का फल मेरे पितरों, पूर्वजों और घर की समृद्धि हेतु समर्पित है।”
3️⃣ व्रत वेदी की स्थापना
• स्वच्छ आसन पर वेदी सजाएँ।
• सामग्री:
o श्रीहरि विष्णु / वामन अवतार की मूर्ति या चित्र
o तुलसी पत्ते या तुलसी पौधा
o शंख और चक्र
o अक्षत, रोली, चंदन
o दीपक और धूप
o फल, खीर, गुड़ (नैवेद्य)
वेदी इस प्रकार सजाएँ जैसे भगवान स्वयं पधारने वाले हों।

4️⃣ दीप प्रज्वलन
• दीप जलाएँ और दोनों हाथ जोड़ें।
• मन में उच्चारण करें:
“हे प्रभु, यह दीप अंधकार मिटाता है। वैसे ही मेरे पितरों और घर के कष्ट दूर हों।”

5️⃣ आचमन और शुद्धि मंत्र
• गंगाजल से आचमन करें।
• भाव: “हे विष्णु, मेरे विचार, वाणी और कर्म आपकी शरण में हैं।”

6️⃣ भगवान वामन का आवाहन
• ‘ॐ नमो नारायणाय’ मंत्र का जाप करें।
• ध्यान में रखें: “हे प्रभु, आज का व्रत मेरे और मेरे पितरों के कल्याण हेतु है। आपके वामन अवतार की लीला और राजा बलि की भक्ति का स्मरण हो।”

7️⃣ कथा-स्मरण और महत्व
• परिवर्तिनी एकादशी कथा:
त्रेतायुग में एक महान दैत्य राजा बलि थे। उनकी दानशीलता और भक्ति इतनी थी कि उन्होंने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब प्रभु ने वामन अवतार धारण किया और बलि से तीन पग भूमि मांगी। बलि ने सहर्ष अनुमति दी। प्रभु ने पहला पग पृथ्वी, दूसरा पग स्वर्ग और तीसरा पग बलि के सिर पर रखा। बलि की भक्ति और उदारता से भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने वरदान दिया कि बलि और उनके पितरों का स्मरण इस दिन विशेष फलदायी होगा।
महत्व:
1. व्रत से पितृकल्याण और घर की समृद्धि होती है।
2. भक्ति, दान और त्याग के गुण बढ़ते हैं।
3. पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

8️⃣ विष्णु पूजन
1. गंगाजल अर्पण
2. अक्षत, चंदन, रोली अर्पण
3. तुलसी पुष्प अर्पण
4. पीले/सफेद पुष्प अर्पण
5. धूप दीप प्रदक्षिणा
6. नैवेद्य अर्पित करें (खीर, फल, गुड़)
7. जल अर्पण — पितरों और पूर्वजों के लिए
पूजन के दौरान यह भाव रखें कि व्रत का प्रत्येक पुण्य पितरों और घर के कल्याण हेतु समर्पित है।

9️⃣ मंत्र-जाप और रात्रि जागरण
• रात में कम से कम 1–2 घंटे जागरण करें। मंत्र: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और भजन करें।

🔟 द्वादशी पारण
• सूर्योदय के बाद पारण करें।
• सात्त्विक भोजन लें: खीर, चावल, मूंग, फल।
• प्रार्थना करें:
“हे श्रीहरि, इस व्रत का पुण्य मेरे पितरों, पूर्वजों और घर को प्राप्त हो। सभी पितर प्रकाश को प्राप्त हों और घर में सुख-शांति बनी रहे।”

1️⃣1️⃣ व्रत का आध्यात्मिक सार
• यह व्रत भक्ति, दान और धर्म की स्थापना का प्रतीक है।
• राजा बलि और वामन अवतार की कथा का स्मरण व्रत को अधिक फलदायी बनाता है।
• व्रत पालन से जीवन में संतान सुख, वैभव, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीगणेशाय नमः।
श्रीसरस्वत्यै नमः।
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— “हे प्रभो! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसका व्रत कैसे किया जाता है और उसका फल क्या होता है?” तब भगवान विष्णु ने कहा— “हे युधिष्ठिर! भाद्रपद शुक्ल एकादशी को परिवर्तिनी (Parivartini) Ekadashi भी कहा जाता है। यह वही एकादशी है जिस दिन मैं वामन अवतार के रूप में प्रकट हुआ था। जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इस दिन मैंने राजा बलि को वामन रूप से जीता और धर्म की स्थापना की।”
कथा
त्रेतायुग में एक महान राजा था — राजा बलि, जो ईमानदार, दानी और धर्मपरायण था। उनकी दान शीलता इतनी प्रसिद्ध थी कि उन्होंने देवों के स्वर्गलोक को भी विजय कर लिया। देवों ने जब बलि को युद्ध में हराया नहीं पाया, तो वे भगवान विष्णु के पास गए और प्रार्थना की कि संसार में संतुलन स्थापित किया जाए। भगवान विष्णु ने इस हेतु वामन अवतार धारण किया — एक ब्राह्मण बालक का रूप। उन्होंने राजा बलि के यज्ञ स्थलों पर जाकर तीन पग भूमि माँगी। राजा बलि ने बिना किसी द्विधा के यह दान देने का वचन दिया। तब भगवान ने विराट रूप धारण किया और पृथ्वी, स्वर्ग और उस स्थान को अपने पैरों से मापा। जहाँ तीसरा पग शेष था, बलि ने अपने ही सिर को भूमि दान के रूप में अर्पित किया। भगवान ने तब उनके सिर पर तीसरा पग रखा और उन्हें पाताललोक भेज दिया, परन्तु उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि वे प्रत्येक वर्ष इसी एकादशी को सम्मानित किए जाएँ।
🔹 इस एकादशी को परिवर्तिनी कहा जाता है क्योंकि
— भगवान विष्णु अपने योगनिद्रा (चातुर्मास) के दौरान करवट बदलते हैं। यह बदलना प्रतीक है कि संसार में भगवान का चातुर्मास के बाद पुनः प्रकट होना और जीवन में परिवर्तन लाना।
🔹 यह दिन वामन अवतार की दिव्य लीला का स्मरण भी है — जो संसार में संतुलन, धर्म और सत्य की पुनः स्थापना के लिए लिया गया।
व्रत का महत्त्व
परिवर्तिनी एकादशी का पालन करने से—
• समस्त पाप नष्ट होते हैं,
• जीवन में धर्म, शांति और संतुलन आता है,
• भक्त को स्वर्गीय फल और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह एकादशी भक्त को वामनदेव की पूजा से भी अधिकार देती है क्योंकि यह अवतार विष्णु का पाँचवाँ अवतार माना जाता है।
कथा-पाठ समाप्ति
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ अनंताय नमः।
॥ हरि: ॐ तत्सत् ॥