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इंदिरा एकादशी

श्री वेदव्यासजी कहते हैं — हे राजन्! अब मैं तुम्हें इंदिरा नामक एकादशी का पुण्यमय व्रत सुनाता हूँ, जिसके प्रभाव से पितर भी नरक-बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

इंदिरा एकादशी व्रत–पूजा विधि
एकादशी का स्वरूप
• मास — आश्विन कृष्ण पक्ष
• नाम — इंदिरा एकादशी
• देवता — श्रीहरि विष्णु
• विशेष फल — पितृमोक्ष, पितृदोष शांति, कुल उद्धार
शास्त्रों में कहा गया है — “इंदिरा एकादशी पितॄणां उद्धारिणी” अर्थात यह एकादशी पितरों को नरक से मुक्त करने वाली है।
व्रत का विशेष उद्देश्य
यह व्रत मुख्यतः किया जाता है —
• पितृदोष निवारण हेतु
• दिवंगत पिता-माता की शांति हेतु
• अकाल मृत्यु, अतृप्त आत्मा, नरकगमन से मुक्ति हेतु
• कुल में बार-बार कष्ट आने पर
पूजा-विधि
1️⃣ प्रातः स्नान एवं शुद्धि
• ब्रह्ममुहूर्त में उठें
• गंगाजल या शुद्ध जल मिलाकर स्नान करें
• स्वच्छ वस्त्र धारण करें
• घर में मौन और सात्त्विक वातावरण रखें
2️⃣ व्रत संकल्प
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठें। दाहिने हाथ में जल लेकर कहें — “अद्य आश्विन मासे कृष्ण पक्षे
इंदिरा नाम्नी एकादश्यां अहं (अपना नाम) पितृमोक्षार्थं श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं व्रतमहं करिष्ये।” भावार्थ — मैं यह व्रत अपने पितरों के उद्धार हेतु कर रहा/रही हूँ।

3️⃣ पूजा वेदी की स्थापना
वेदी पर रखें —
• श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा या चित्र
• तुलसी पत्र
• दीपक
• जल पात्र
• अक्षत
• चंदन
• पुष्प
• फल या सात्त्विक नैवेद्य
विशेष: इस दिन तुलसी अति आवश्यक मानी गई है।
4️⃣ दीप प्रज्वलन
दीप जलाकर प्रार्थना करें — “हे श्रीहरि, जैसे यह दीप अंधकार हरता है वैसे ही मेरे पितरों के अज्ञान, पाप और बंधन दूर हों।”
5️⃣ भगवान विष्णु का आवाहन
मंत्र जप करें — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या ॐ नमो नारायणाय मन में भगवान को आसन ग्रहण कराते हुए ध्यान करें।
6️⃣ श्रीहरि पूजन विधि
क्रम इस प्रकार रखें —
1. जल अर्पण
2. चंदन अर्पण
3. अक्षत अर्पण
4. पुष्प अर्पण
5. तुलसी दल अर्पण
6. धूप-दीप
7. नैवेद्य अर्पण
हर अर्पण के साथ मन में कहें — “यह समस्त पुण्य मेरे पितरों को समर्पित हो।”
7️⃣ इंदिरा एकादशी कथा-पाठ (अत्यंत आवश्यक)
इस व्रत में कथा सुनना या पढ़ना अनिवार्य है। राजा इंद्रसेन और उनके पितृ नरक मोचन की कथा, बिना कथा के यह व्रत पूर्ण फल नहीं देता।
8️⃣ पितृ अर्पण (विशेष विधि)
कथा के बाद हाथ में जल लेकर कहें — “इदं विष्णुपूजनजन्यं पुण्यं मम पितॄणां समर्पयामि।” यह इंदिरा एकादशी की सबसे मुख्य क्रिया है।
9️⃣ व्रत नियम
• अन्न पूर्ण वर्जित
• फलाहार या निर्जल — यथाशक्ति
• झूठ, क्रोध, निंदा वर्जित
• ब्रह्मचर्य पालन
• भूमि पर शयन श्रेष्ठ माना गया है
रात्रि जागरण
रात्रि में — विष्णु सहस्रनाम , हरि नाम संकीर्तन , पितृ स्मरण , दीप प्रज्वलन , जागरण करने से व्रत का फल दोगुना हो जाता है।
द्वादशी पारण
• सूर्योदय के बाद पारण करें
• ब्राह्मण या गरीब को दान दें
• गाय, कौआ, चींटी को अन्न अर्पित करें
• फिर स्वयं भोजन करें
व्रत फल (शास्त्रानुसार)
पद्मपुराण में कहा गया है —
• पितर नरक से मुक्त होते हैं
• पितृदोष शांत होता है
• कुल में सुख-शांति आती है
• संतान बाधा दूर होती है
• वंश में तेज और पुण्य बढ़ता है
विशेष शास्त्रीय वाक्य
“इंदिरा एकादशी व्रतेन पितरः स्वर्गमाप्नुवन्ति।”
अर्थात — इंदिरा एकादशी के व्रत से पितर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
# इंदिरा एकादशी व्रत कथा
ॐ श्री गणेशाय नमः ।
ॐ नमो नारायणाय ।
श्री वेदव्यासजी कहते हैं — हे राजन्! अब मैं तुम्हें इंदिरा नामक एकादशी का पुण्यमय व्रत सुनाता हूँ, जिसके प्रभाव से पितर भी नरक-बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
प्राचीन काल की बात है। अवन्ती नाम की एक परम पुण्यनगरी थी। वहाँ इंद्रसेन नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे सत्यवादी, विष्णुभक्त, दानशील तथा ब्राह्मणों के पूजक थे। राजा प्रतिदिन नियमपूर्वक भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना करते थे और प्रजा का पालन धर्म के अनुसार करते थे।
एक समय ऐसा आया कि राजा इंद्रसेन का मन अत्यंत व्याकुल रहने लगा। उन्हें रात्रि में भयानक स्वप्न दिखाई देने लगे। हृदय में अकारण भय, चिंता और दुःख उत्पन्न होने लगा। राजा मन-ही-मन विचार करने लगे — “निश्चय ही यह कोई दैविक संकेत है। यह पीड़ा मेरी नहीं, अवश्य ही मेरे पितरों से संबंधित है।”
उसी समय देवर्षि नारद मुनि आकाश मार्ग से वहाँ पधारे। राजा ने उन्हें आसन दिया, चरणों में प्रणाम किया और विनीत भाव से कहा — “हे देवर्षे! मेरे हृदय में जो दुःख उत्पन्न हो रहा है, उसका कारण कृपा कर मुझे बताइए।”
नारद मुनि ने ध्यान लगाया और बोले — “राजन्! तुम्हारे पिता अपने पूर्वजन्म के पापकर्मों के कारण नरक लोक में अत्यंत कष्ट भोग रहे हैं। उसी पीड़ा का प्रभाव तुम्हारे हृदय तक पहुँच रहा है।” यह सुनकर राजा इंद्रसेन अत्यंत शोकाकुल हो गए। नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने करुण स्वर में कहा — “हे भगवन्! मैं अपने पिता को उस दुःख से मुक्त कराना चाहता हूँ। कृपा कर मुझे कोई उपाय बताइए।”
तब नारद मुनि बोले — “राजन्! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी ‘इंदिरा एकादशी’ कहलाती है। जो मनुष्य इस दिन श्रद्धा से उपवास करता है, श्रीहरि विष्णु का पूजन करता है, रात्रि-जागरण करता है और उस व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित करता है — उसके पितर नरक से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।”
नारद मुनि ने आगे कहा — “राजन्! इस व्रत में विशेष रूप से — अन्न त्याग , विष्णु पूजन , तुलसी अर्पण , कथा श्रवण , रात्रि जागरण अत्यंत आवश्यक हैं।”
राजा इंद्रसेन ने हाथ जोड़कर कहा — “हे देवर्षि! मैं यह व्रत पूर्ण श्रद्धा और नियम से करूँगा।” जब इंदिरा एकादशी का पावन दिन आया, राजा ने प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए। उन्होंने भगवान श्रीविष्णु का विधिवत पूजन किया, तुलसी दल अर्पित किए, हरिनाम का स्मरण किया और पूर्ण उपवास रखा। रात्रि में उन्होंने जागरण करते हुए विष्णु-सहस्रनाम का पाठ किया। अंत में राजा ने करबद्ध होकर कहा — “हे श्रीहरि! इस व्रत, तप, भक्ति और उपासना से जो पुण्य प्राप्त हुआ है, वह समस्त पुण्य मैं अपने पितरों को समर्पित करता हूँ। कृपा कर उन्हें नरक-बंधन से मुक्त करें।”
उसी क्षण आकाश से दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। देवदुंदुभियाँ बज उठीं। राजा के पिता नरक यातना से मुक्त होकर
स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। आकाशवाणी हुई — “राजन्! तुम्हारे व्रत से तुम्हारे पितरों का उद्धार हुआ। इंदिरा एकादशी पितृमोक्ष प्रदान करने वाली है।”
राजा इंद्रसेन ने भगवान श्रीहरि को साष्टांग प्रणाम किया। उनका हृदय पूर्णतः शांत हो गया। उनके जीवन का पितृऋण पूर्ण हुआ।
फलश्रुति
जो मनुष्य श्रद्धा से इंदिरा एकादशी का व्रत करता है — उसके पितर तृप्त होते हैं। पितृदोष शांत होता है।
कुल में शांति, पुण्य और वृद्धि होती है। अंत में वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे इंदिरा एकादशी व्रत कथा सम्पूर्णा।