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रमा एकादशी

श्रीवेदव्यासजी कहते हैं — हे राजन्! अब मैं तुम्हें रमा नामक एकादशी के उत्तम व्रत की पूजा-विधि सुनाता हूँ, जिसके प्रभाव से दरिद्रता, पाप और भय नष्ट हो जाते हैं
और मनुष्य को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

रमा एकादशी व्रत–पूजा विधि
ॐ श्री गणेशाय नमः ।
ॐ नमो नारायणाय ।
श्रीवेदव्यासजी कहते हैं — हे राजन्! अब मैं तुम्हें रमा नामक एकादशी के उत्तम व्रत की पूजा-विधि सुनाता हूँ, जिसके प्रभाव से दरिद्रता, पाप और भय नष्ट हो जाते हैं
और मनुष्य को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
एकादशी का स्वरूप
• मास — कार्तिक कृष्ण पक्ष
• नाम — रमा एकादशी
• आराध्य देव — श्रीहरि विष्णु
• विशेष फल — दरिद्रता नाश, ऐश्वर्य प्राप्ति, पाप क्षय
शास्त्रों में कहा गया है — “रमा एकादशी व्रतेन दरिद्रता विनश्यति।” अर्थात — रमा एकादशी के व्रत से निर्धनता का नाश होता है।
पूजा–विधि
1️⃣ प्रातः स्नान एवं शुद्धि
ब्रह्ममुहूर्त में उठकर गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें। शुद्ध वस्त्र धारण कर मन, वाणी और कर्म से पवित्र होने का संकल्प करें।
2️⃣ व्रत–संकल्प
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दाहिने हाथ में जल लेकर कहें — “अद्य कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे रमा नाम्नी एकादश्यां श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं अहं व्रतमिदं करिष्ये।” जल भूमि पर छोड़ दें।
3️⃣ पूजा–स्थान की स्थापना
स्वच्छ स्थान पर वेदी बनाकर उस पर रखें —
• भगवान श्रीविष्णु की प्रतिमा या चित्र
• तुलसी दल
• दीपक
• धूप
• अक्षत
• चंदन
• पुष्प
• फल या सात्त्विक नैवेद्य

4️⃣ दीप–प्रज्वलन
दीप जलाकर प्रार्थना करें — “हे श्रीहरि, जैसे यह दीप अंधकार का नाश करता है, वैसे ही मेरे जीवन के क्लेश और दरिद्रता दूर हों।”
5️⃣ भगवान विष्णु का आवाहन
तीन बार जप करें — ॐ नमो नारायणाय , मन में भगवान श्रीहरि का ध्यान करें।
6️⃣ श्रीविष्णु पूजन
निम्न क्रम से पूजन करें —
1. जल अर्पण
2. चंदन अर्पण
3. अक्षत अर्पण
4. पुष्प अर्पण
5. तुलसी दल अर्पण
6. धूप–दीप
7. नैवेद्य अर्पण
प्रत्येक अर्पण के साथ मन में भाव रखें — “हे प्रभु, मेरी दरिद्रता और दुर्भाग्य का नाश करें।”
7️⃣ रमा एकादशी कथा–पाठ
पूजन के पश्चात् रमा एकादशी की कथा अवश्य पढ़ें या सुनें। शास्त्र कहते हैं — “कथाश्रवणेन व्रतं सिद्ध्यति।” बिना कथा के व्रत अपूर्ण माना गया है।
8️⃣ जप एवं स्तुति
इसके पश्चात — विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
9️⃣ व्रत नियम
• अन्न त्याग अनिवार्य
• फलाहार या निर्जल — यथाशक्ति
• झूठ, क्रोध, निंदा वर्जित
• ब्रह्मचर्य पालन
• भूमि पर शयन श्रेष्ठ
रात्रि जागरण
रात्रि में — हरिनाम संकीर्तन , विष्णु स्तुति , दीप प्रज्वलन , जागरण करने से व्रत का फल अनेक गुना बढ़ जाता है।
द्वादशी पारण
द्वादशी तिथि में —
• स्नान करें
• भगवान को भोग अर्पित करें
• ब्राह्मण या निर्धन को दान दें
• तत्पश्चात स्वयं भोजन करें
व्रत–फल
पद्मपुराण में वर्णित है —
• निर्धनता नष्ट होती है
• गृहस्थ जीवन में स्थिरता आती है
• पापों का क्षय होता है
• यश, धन और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है
• अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है
रमा एकादशी का सार:
यह व्रत सिखाता है कि धन का मूल केवल परिश्रम नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की कृपा है।
# रमा एकादशी व्रत कथा
ॐ श्री गणेशाय नमः ।
ॐ नमो नारायणाय ।
श्रीवेदव्यासजी कहते हैं— हे राजन्! अब मैं तुम्हें कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की रमा नामक एकादशी की कथा सुनाता हूँ, जिसके श्रवण मात्र से पवित्र फल की प्राप्ति होती है।
बहुत समय पहले एक नगर में एक धर्मपरायण एवं सत्यवादी राजा रहते थे। राजा का नाम मुचुकुन्द था। राजा विष्णु भक्ति में लीन रहते थे। उनकी एक रुपवती, शीलवती तथा धर्मशील पुत्री थी, जिसका नाम चन्द्रभागा था। चन्द्रभागा का विवाह एक योग्य युवक शोभन से हुआ था। विवाह के पश्चात् दोनों पति पत्नी भक्ति, धर्म और व्रतों का पालन करते थे। एक बार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में रमा नामक एकादशी आई। चन्द्रभागा ने मन में निश्चय किया कि आज का व्रत वह विधिवत् करेगी। उसने अपने श्रीमान शोभन से कहा— “हे स्वामी! आज रमा एकादशी का पवित्र व्रत है। मैं इसे विधि से करना चाहती हूँ। आप भी मेरे साथ पालन कीजिए।” परन्तु शोभन दुर्बल स्वास्थ्य से पीड़ित था। उसने कहा— “प्रिय! मेरा शरीर आज व्रत के कठिन नियम को सहन नहीं कर पाएगा।” चन्द्रभागा ने दुःख से कहा— “यदि आप साथ नहीं कर सकते, तो मैं अकेली यह व्रत विधिपूर्वक करुँगी।”
चन्द्रभागा ने सुबह से उपवास आरम्भ किया। पूजा आराधना, तुलसी अर्पण और भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए
पूरे दिन का उपवास उसने संयम और श्रद्धा से किया। रात्रि में उसने जागरण किया। विष्णु मंत्रों का जाप किया—
ॐ नमो नारायणाय। हरिनाम संकीर्तन किया। रात्रि प्रभात तक निराहार तथा वाणी मन संयम में रखा।
दु:ख का प्रसंग
द्वादशी के प्रातः होते उसके पति शोभन के प्राणों ने शरीर को त्याग दिया। उनका देहांत हुआ। राजमहल में हाहाकार मच गया। सब लोग रोते सूखते गये। परन्तु चन्द्रभागा ने मन में कहा— “हे प्रभु! यह जीवन आपका विधान है। यदि मेरा व्रत सत्य और पवित्र है, तो आपका प्रभाव भी अवश्य मिलेगा।” वह अपने श्रीमान का शरीर
पूजनीय मानकर व्रत का पारण पूर्ण किया।
दिव्य प्रभाव
जैसे ही द्वादशी को रमा एकादशी का पारण सम्पन्न हुआ, चन्द्रभागा ने परम श्रद्धा से प्रार्थना की— “हे श्रीहरि!
यदि यह व्रत आपके प्रिय है, तो मेरे प्रिय के शरीर में पुनः प्राण संचार करें।” तभी दिव्य प्रकाश हुआ। आकाश से स्वर्णिम वर्षा हुई। अंतर्यात्रा के प्रभाव से शोभन फिर से जीवित हो उठा। सभी लोगों ने विष्णु चरणों में प्रणाम किया। देवदूतों ने आकाशवाणी दी— “हे भक्तजन! जिसने रमा एकादशी का व्रत विश्वासपूर्वक किया, उसके पाप नष्ट होते हैं, उसकी दरिद्रता दूर होती है, और जीवन में सुख समृद्धि तथा सौभाग्य बढ़ता है।”
कथा का सार
जो मनुष्य रमा एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करता है—
⭕ उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं
⭕ घर में समृद्धि आती है
⭕ दंपति जीवन में सौभाग्य बढ़ता है
⭕ विष्णुलोक की प्राप्ति होती है