प्रारंभिक संकल्प
ॐ श्री गणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें।
पद्मिनी एकादशी — पूजा विधि
प्रारंभिक संकल्प
ॐ श्री गणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें।
संकल्प मंत्र (भाव सहित):
“मम सकल पापक्षयपूर्वकं श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं अधिकमासे शुक्लपक्षे पद्मिनी एकादशी व्रतं करिष्ये।”
पूजा-स्थल की तैयारी
• स्वच्छ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ
• उस पर भगवान श्रीविष्णु / श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
• साथ में श्रीलक्ष्मी माता का स्वरूप रखें
• कलश में जल, आम्र-पत्र, नारियल रखें
• तुलसी पत्र अवश्य रखें (यह व्रत तुलसी-प्रधान है)
पद्मिनी एकादशी पूजन विधि
1️⃣ आचमन एवं शुद्धि
ॐ केशवाय नमः।
ॐ नारायणाय नमः।
ॐ माधवाय नमः।
2️⃣ भगवान विष्णु का ध्यान
शंखचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरं हरिम्।
सर्वपापहरं देवं वन्दे विष्णुं जगद्गुरुम्॥
3️⃣ पंचोपचार / षोडशोपचार पूजन
क्रमशः अर्पण करें —
• जल
• चंदन
• पुष्प
• धूप
• दीप
• नैवेद्य (फल, मिष्ठान्न, पंचामृत)
• तुलसी-पत्र (अत्यंत अनिवार्य)
4️⃣ विष्णु स्तुति
नमः पद्मनाभाय नमः कमलवासिने।
नमस्ते पद्मिनीप्रिय देवेश जगत्पते॥
5️⃣ पद्मिनी एकादशी व्रत-कथा पाठ
इस एकादशी में व्रत-कथा का श्रवण अनिवार्य माना गया है।
6️⃣ जप-अनुष्ठान
निम्न में से कोई एक करें — • विष्णु सहस्रनाम , “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” , ॐ विष्णवे नमः” (108 या 1008 जप)
7️⃣ रात्रि जागरण (अत्यंत श्रेष्ठ)
शास्त्रों में कहा गया है — पद्मिनी एकादशी का जागरण सहस्र एकादशियों के बराबर फल देता है।
• भजन
• हरिकथा
• विष्णु नाम-स्मरण
• दीपदान
व्रत के नियम
✔️ उपवास — निर्जल / फलाहार / एकभुक्त (शक्ति अनुसार)
✔️ ब्रह्मचर्य पालन
✔️ तामसिक आहार वर्जित
✔️ क्रोध, निंदा, असत्य त्याग
✔️ भूमि शयन श्रेष्ठ
द्वादशी पारण
द्वादशी तिथि में — • ब्राह्मण को भोजन या दान • स्वयं तुलसी-युक्त विष्णु-प्रसाद से पारण
पद्मिनी एकादशी का विशेष महत्व
• यह अधिक मास की एकादशी है
• यह उन भक्तों के लिए भी फलदायी है जो नियमित एकादशी व्रत नहीं कर पाते
• यह व्रत अश्वमेध यज्ञ से भी श्रेष्ठ फल देता है
• पापक्षय, सौभाग्य, ऐश्वर्य और मोक्ष प्रदान करता है
पद्मिनी एकादशी की संपूर्ण कथा
ॐ श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
नारद–श्रीकृष्ण संवाद
नारद उवाच — हे भगवन्! जब वर्ष में अधिक मास आता है, तब उस मास में कौन-सा व्रत जीवों के पापों का नाश कर उन्हें उत्तम गति प्रदान करता है? कृपा कर उसका विस्तार से वर्णन करें। श्रीभगवान उवाच — हे देवर्षे! अधिक मास मेरा ही स्वरूप है। इस मास में की गई भक्ति अक्षय फल देने वाली होती है। अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मिनी नाम से प्रसिद्ध है। यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली है। हे नारद! अब मैं तुम्हें इस व्रत की महिमा समझाने हेतु एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ।
कार्तवीर्य अर्जुन का पूर्व चरित्र
प्राचीन काल में हैहय वंश में एक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ— कार्तवीर्य अर्जुन, जो सहस्र भुजाओं से युक्त था। उसने— • पृथ्वी को जीत लिया • देवताओं को पराजित किया • अपार ऐश्वर्य प्राप्त किया
परंतु हे नारद! अत्यधिक सामर्थ्य के कारण उसके भीतर अहंकार उत्पन्न हो गया। उसने— ब्राह्मणों का अपमान किया , तपस्वियों को कष्ट दिया , धर्म की मर्यादा का उल्लंघन किया यद्यपि वह बाह्य रूप से महान राजा था, किन्तु अंतःकरण में धर्म से दूर हो चुका था।
पापफल और पतन
कालांतर में उसके पुण्य क्षीण हो गए। जब उसका शरीर छूटा, तो उसके पापों के कारण उसे नरकगति प्राप्त हुई। नरक में वह अत्यंत दुःख, तृषा और पीड़ा से व्याकुल हो उठा। वहाँ उसने यमदूतों से कहा— “मैंने अपार दान किए,
अनेक यज्ञ किए, फिर भी मुझे यह भयंकर गति क्यों मिली?” यमदूतों ने उत्तर दिया— “राजन्! तुम्हारे दान और यज्ञ
अहंकार से युक्त थे। ब्राह्मण-द्रोह और धर्म-उपेक्षा के कारण तुम्हें यह फल प्राप्त हुआ है।”
पद्मिनी एकादशी का उपदेश
नरक में ही उसे पूर्व जन्म के किसी पुण्य के प्रभाव से महर्षि का स्मरण हुआ। ऋषि ने कहा— “हे राजन्! यदि उद्धार की कामना है, तो अधिक मास की शुक्ल पक्ष पद्मिनी एकादशी का व्रत श्रद्धा से करो। इस व्रत का प्रभाव
नरकबंधन भी काट देता है।” कार्तवीर्य अर्जुन ने पूर्ण विनय से उस व्रत को स्वीकार किया।
पद्मिनी एकादशी व्रत का आचरण
उसने एकादशी का उपवास किया , मन, वाणी और कर्म से भगवान श्रीविष्णु का स्मरण किया , रात्रि में जागरण किया , अपने समस्त कर्मों का फल भगवान को समर्पित किया , हे नारद! यह व्रत उसने अत्यंत पश्चाताप और श्रद्धा से किया।
व्रत का फल — उद्धार
व्रत के प्रभाव से— •उसके समस्त पाप नष्ट हो गए • नरक के बंधन टूट गए • यमदूत उसे छोड़कर चले गए तत्पश्चात भगवान विष्णु के दूत आए और उसे उत्तम लोक में ले गए। इस प्रकार इतना बड़ा पापी भी पद्मिनी एकादशी के प्रभाव से उद्धार को प्राप्त हुआ।
श्रीभगवान उवाच — हे नारद! जो मनुष्य श्रद्धा से पद्मिनी एकादशी का व्रत करता है— उसके पाप चाहे कितने ही महान क्यों न हों ,उसका उद्धार निश्चित होता है वह अंततः वैकुण्ठ को प्राप्त करता है यह व्रत उन लोगों के लिए भी है जो अन्य एकादशियाँ नियमपूर्वक नहीं कर पाते।
फलश्रुति
जो मनुष्य पद्मिनी एकादशी की इस कथा को श्रद्धा से पढ़ता, सुनता या सुनवाता है— उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं, उसके कुल का उद्धार होता है, और मृत्यु के पश्चात वह श्रीविष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।
उपसंहार
इति श्रीपद्मपुराणे अधिकमासे शुक्लपक्षे पद्मिनी एकादशी व्रत कथा सम्पूर्णा।