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परमा एकादशी

परमा एकादशी ,अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आती है। यह एकादशी अत्यंत दरिद्रता, पाप, ऋण, और कर्मबंधन का नाश करने वाली मानी गई है। पद्मपुराण के अनुसार यह व्रत राजा सुकेतुमान के उद्धार से प्रसिद्ध है।

परमा एकादशी — संपूर्ण पूजा विधि



प्रातःकाल स्नान व शुद्धि


• ब्रह्ममुहूर्त में उठें
• गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें
• शुद्ध, सादा वस्त्र धारण करें (सफेद / पीले श्रेष्ठ)
भाव रखें —
“आज मैं भगवान श्रीहरि की कृपा से अपने समस्त पापों और दारिद्र्य के नाश हेतु परमा एकादशी व्रत करता/करती हूँ।”

संकल्प


पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लें। संकल्प भाव : “अधिकमासे कृष्णपक्षे परमा एकादशी व्रतं मम सकल पापक्षयपूर्वकं श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं करिष्ये।” संकल्प के बिना व्रत अधूरा माना गया है।

पूजा-स्थल (वेदी) की स्थापना


चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर रखें—
• भगवान श्रीविष्णु / श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र
• शंख, चक्र (यदि हों)
• तुलसी दल (अनिवार्य)
• दीपक (घी का श्रेष्ठ)
• धूप
• गंगाजल
• चंदन
• पुष्प
• फल / मिष्ठान्न (नैवेद्य)
वेदी को ऐसे सजाएँ मानो भगवान स्वयं पधार रहे हों।

दीप-प्रज्वलन — अज्ञान और दारिद्र्य का नाश


दीप जलाते समय कहें— “हे श्रीहरि! जैसे यह दीप अंधकार नष्ट करता है, वैसे ही मेरे जीवन का दरिद्रता, पाप और मोह भी नष्ट हो।” परमा एकादशी में दीपदान का विशेष महत्व है।

आचमन व आंतरिक शुद्धि


गंगाजल से आचमन कर मन में यह भाव रखें— “मेरे विचार, वाणी और कर्म आज श्रीविष्णु को समर्पित हैं।”

भगवान विष्णु का आवाहन


मंत्र जाप करते हुए ध्यान करें— मंत्र: ॐ नमो नारायणाय या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ; भाव : “हे श्रीहरि! आप ही दीनबंधु हैं, आप ही दारिद्र्यनाशक हैं। कृपा कर मेरे व्रत को स्वीकार करें।”

श्रीविष्णु पूजन


निम्न क्रम से अर्पण करें—
• गंगाजल
• अक्षत
• चंदन
• पुष्प
• तुलसी-दल (सबसे प्रधान)
• धूप
• दीप
• नैवेद्य (फल / खीर / सात्त्विक मिष्ठान्न)
• जल अर्पण
पूजन भाव: “हे प्रभु! आज के व्रत का प्रत्येक पुण्य आपके चरणों में समर्पित है।”

परमा एकादशी व्रत-कथा पाठ


पद्मपुराण में स्पष्ट कहा गया है — कथा के बिना यह व्रत पूर्ण फल नहीं देता।

जप / पाठ


इनमें से कोई एक करें— • विष्णु सहस्रनाम • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” — 108 / 1008 जप • श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 . यह जप कर्मबंधन काटने वाला माना गया है।

रात्रि जागरण — परमा एकादशी का रहस्य


परमा एकादशी में रात्रि जागरण अत्यंत फलदायी है। • हरिनाम संकीर्तन • विष्णु कथा • दीप जलाकर ध्यान , शास्त्रों में कहा गया है — इस रात्रि में किया गया जागरण जन्म-जन्मांतर के दारिद्र्य को नष्ट करता है।

द्वादशी पारण (अगले दिन)


• सूर्योदय के बाद
• तुलसी-युक्त विष्णु प्रसाद से पारण करें
• ब्राह्मण या गरीब को दान करें (शक्ति अनुसार)
प्रार्थना: “हे श्रीहरि! मेरे व्रत का फल मुझे और मेरे कुल को धर्म, शांति और भक्ति प्रदान करे।”

परमा एकादशी व्रत-कथा


ॐ श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।


नारद–श्रीकृष्ण संवाद
नारद उवाच — हे भगवन्! आपने अधिक मास की शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी का वर्णन किया। अब कृपा कर यह बताइए कि अधिक मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है और उसका क्या फल है? श्रीभगवान उवाच — हे देवर्षे! अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी परमा नाम से प्रसिद्ध है। यह एकादशी
अत्यंत दारिद्र्य, पापकर्म और दुर्भाग्य का नाश करने वाली है। अब मैं तुम्हें इसकी महिमा समझाने हेतु एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ।
राजा सुकेतुमान का परिचय
प्राचीन काल में एक धर्मपरायण राजा हुआ— राजा सुकेतुमान। वह— सत्यप्रिय , दानशील , विष्णु-भक्त , प्रजा-वत्सल था। किन्तु हे नारद! पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण उसके जीवन में अत्यंत दारिद्र्य और दुःख आ गया।
दारिद्र्य और राज्य का नाश
कालांतर में राजा सुकेतुमान का राज्य नष्ट हो गया , धन समाप्त हो गया , सेवक साथ छोड़ गए , परिवार भूख-प्यास से पीड़ित हो गया राजा सुकेतुमान अपनी पत्नी सहित वनों में भटकने लगे। वन में फल-मूल नहीं मिलते , जल दुर्लभ हो गया , शरीर दुर्बल हो गया । राजा बार-बार मन में सोचते— “मैंने तो धर्म किया, दान दिया, फिर यह भयंकर दारिद्र्य क्यों?”
ऋषि का दर्शन
एक दिन वन में भटकते हुए राजा सुकेतुमान एक शांत आश्रम में पहुँचे। वहाँ उन्होंने महान तपस्वी कौण्डिन्य ऋषि के दर्शन किए , राजा ने दंडवत प्रणाम कर कहा— “हे भगवन्! मैं कौन-सा कर्म कर बैठा जिससे यह भयंकर दुःख मिला? कृपा कर मेरा उद्धार बताइए।”
ऋषि का उपदेश — परमा एकादशी
ऋषि बोले— “राजन्! यह सब पूर्व कर्मों का फल है। परंतु इसका उपाय भी है। अधिक मास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी का व्रत करो। यदि श्रद्धा से— • उपवास • श्रीविष्णु पूजन • रात्रि जागरण • कथा श्रवण करोगे, तो तुम्हारा दारिद्र्य नष्ट होगा और पुनः ऐश्वर्य प्राप्त होगा।” यह सुनकर राजा सुकेतुमान के हृदय में आशा का संचार हुआ।
परमा एकादशी व्रत का पालन
राजा ने— विधिपूर्वक उपवास किया , श्रीविष्णु का पूजन किया , तुलसी-दल अर्पित किया , रात्रि जागरण किया , हरिनाम का स्मरण किया और कहा— “हे प्रभु! यदि मुझसे कोई अपराध हुआ हो तो कृपा कर क्षमा करें।”
व्रत का प्रभाव
हे नारद! परमा एकादशी के प्रभाव से— राजा के समस्त पाप नष्ट हो गए , दारिद्र्य समाप्त हो गया , राज्य पुनः प्राप्त हुआ , धन-धान्य की वृद्धि हुई , जीवन में शांति आई। राजा सुकेतुमान फिर से धर्मपूर्वक राज्य करने लगे। श्रीभगवान उवाच — हे नारद! जो मनुष्य— • अत्यंत निर्धन हो • पापों से ग्रस्त हो • दुर्भाग्य से पीड़ित हो , यदि वह परमा एकादशी का व्रत श्रद्धा से करता है, तो निश्चित रूप से— • उसका दारिद्र्य नष्ट होता है • उसके पाप कटते हैं • उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों की प्राप्ति होती है

फलश्रुति


जो मनुष्य परमा एकादशी की इस कथा को श्रद्धा से पढ़ता, सुनता या सुनवाता है— वह निर्धनता से मुक्त होता है, उसके कुल का उद्धार होता है, और मृत्यु के पश्चात वह श्रीविष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।

परमा एकादशी का आध्यात्मिक सार


• यह दारिद्र्य-नाशिनी एकादशी है
• कर्मों के भारी बंधन को काटती है
• दरिद्र, पीड़ित और पश्चातापी के लिए सबसे करुणामयी एकादशी
• केवल एक बार भी करने से जीवन की दिशा बदल सकती है

इति श्रीपद्मपुराणे अधिकमासे कृष्णपक्षे परमा एकादशी व्रत कथा सम्पूर्णा।
समापन मंत्र
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽहमिति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम॥